शनिवार, 6 अक्तूबर 2007

मेरा तेरा नाता

एक कई साल पुरानी कविता छाप रही हूँ........पता नहीं इसके भाव अभी पुराने पड़े हैं या नहीं। आप सब पढ़े और बताएँ....

संबंध


चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती ...

हमें सात फेरों या कि कुबूल है से
क्या लेना-देना

हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया बाती के
संबंध को......... मसलन रोशनी

हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा खत हमारी चमक में ।

तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना....कुछ पल।

7 टिप्‍पणियां:

हर्षवर्धन ने कहा…

आभाजी
बहुत खूबसूरती से भावनाएं उभरकर आ रही हैं। और, भावनाएं तो हमेशा एक सी ही रहती हैं। वो, समय बीतने के साथ बदलती थोड़े ना हैं।

आभा ने कहा…

हर्ष भाई
आपने पढ़ा अच्छा लगा...सच कह रहे हैं भावनाएं कभी पुरानी नहीं पड़तीं...

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छी कविता है। अभी अभयतिवारीजी आये थे। उनसे आपकी तारीफ़ भी सुनी। कामना है कि दिये-बाती को काम भर का तेल मिलता रहे। :)

आभा ने कहा…

आपकी कामना का आदर करती हूँ। भला बिना तेल के दिया बाती रोशनी के बारे में सोच सकते हैं क्या। यह तो अंड्रस्टुड है अनूप जी आपकी स्माइली अच्छी है ।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर और कोमल भाव हैं. देर से आया, क्षमा करें.

आनन्द आया रचना पढ़कर.

आभा ने कहा…

समीर भाई
क्षमा माँग कर शर्मिंदा न करें....वैसे हमें आपकी टिप्पणी का इंतजार रहता है।

सुभाष नीरव ने कहा…

"अपना घर" का पहलीबार अवलोकन किया। सुन्दर है। आपकी यह कविता नि:संदेह बहुत सुन्दर है।