
इलाहाबाद ब्लॉगिंग संगोष्ठी में जाने से पहले ही हमारी बनारस की घरेलू यात्रा तय हुई थी, यात्रा सुनिश्चित होना ही था कारण यहाँ मुम्बई मे दीवाली की पंद्रह दिन की बच्चों की छुट्टियाँ, फिर उधर यूपी में न सर्दी होगी न गर्मी। बच्चे सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की स्थिति बन गई । तभी पता चला कि इलाहाबाद में ब्लॉगिंग संगोष्ठी भी उन्हीं दिनों तय की गई है । कुल मिला कर मुझे निमंत्रण मेल मिला और मैं संगोष्ठी की भागीदार बनीं।
मुझे खुशी इस बात की थी कि क्या अच्छा मौसम है, बच्चों की छुट्टी और संगोष्ठी साथ-सा। लेकिन इतना तो तय है यदि छुट्टी न होती तो मैं इस ब्लॉगिंग संगोष्ठी में चाह कर भी न होती । खैर बुलाया तो बुलाया, गई तो गई ।
अब बात मुद्दे की । इलाबाद पहुँचने के पहले मैने मेल में मिले आठ मुद्दों में से एक
आखिरी या आठवाँ अभिव्यति की उन्मुक्तता पर बोलना तय किया। और बिंदास होकर अपने प्रयाग राज में दो दिनों के लिए पैर जमाया ताकि जम कर अपनी बात कहूँ और यह मौका न चूकने के जोश के साथ के साथ बातों को रखूँ।
लेकिन इलाहाबाद पहुँच कर बोलना पड़ा ब्लॉग पर बहस के मुद्दे और भाषा । इस अचानक तय मुद्दे पर बरबस बोल गई अई हो दादा...क्या करूँ । फिर जवाब भी खुद ब खुद मिला करूँ क्या डटूँ बहस के मुद्दे पर। जो जँचे
लिख डालूँ
पढ़ डालूँ या
मुझे जो लगा किया अब जिसे जो लगे सो करे
पढ़े या कहे धत्त जाने दे ...
फिर वहाँ ऐसा भी माहौल बनने लगा जैसे अक्सर एक दूसरे की पोस्ट पर बेवजह विपरीत माहौल बन जाता है, पर जो कहना था सो कहा।
मैंने अपना वक्तव्य इन शव्दो मे रखा
मित्रों अभिव्यति की स्वतन्त्रता राजा राम के समय से है तभी किसी एक के कहने पर जनक-दुलारी सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी, सो मुझे भी अपनी बात कहने दें । बाद में टोका टाकी करें । और मुझे लगेगा कि उत्तर देना उचित है तो दूँगी वर्ना आप सब मुझे माफ करेगें, सचमुच सभी ब्लॉगर मित्रों ने धैर्य से सुना इसके लिए उनकी आभारी हूँ
ब्लॉग पर बहस के मुद्दे और भाषा
1-मेरा मानना है कि ब्लॉग बहस की दुनियाँ नही है,वास्तविकता यह है कि हिन्दी समाज में बहस एक सीरे से गायब है लोग बहस नहीं करते बल्कि अपने फैसले सुनाते हैं साथ ही इस अंदाज में पेश आते हैं कि मै महान तू नादान , मैं सही तू गलत। ऐसे माहौल में क्या किसी समाज में चाहे वह ब्लॉग ही क्यों न हो बहस कैसे हो पाएगी और जो बहस होगी भी वह एक तरफा होगी। पूर्वाग्रह से ग्रस्त होगी, और जो थोड़ी बहुत बहस है भी वह बेनामी ब्लॉगर्स की वजह से हमेशा एक गलत दिशा ले लेती है। यह छुपे हुए लोग अपनी दुश्मनियाँ अपनी खुन्नस निकालते हैं
2- मेरा मानना है कि अगर बहस करनी हो तो एक खास ब्लॉग बने, मुद्दे तय किए जाएँ मुद्दे सुझाए जाएँ फिर बहस एक मुकाम पर जाए ताकि ब्लॉग को एक खास पहचान मिले।
3-वैसे भी ब्लॉग अब पहचान का मोहताज नहीं इसका प्रमाण यह इतना बड़ा आयोजन ही है । लेकिन अफसोस है कि ब्लॉग पर बड़े से बड़ा मुद्दा पुराना और उबाऊ हो जाता है। लोग हर दिन नई बात ढ़ूँढते हैं । एक ही बात को लेकर चलना ब्लॉग का स्वभाव नहीं है।
4- ब्लॉग बोले तो बहता पानी । हर पल चढ़ाई गई पोस्ट किसी भी बहस को धूमिल करती जाती है ।
5- जो लोग बहस करते भी हैं वह बेसिकली सामने वाले ब्लॉगर के संहार और सामाजिक हत्या के प्रयास में लगे रहते हैं । न तो उनके यहाँ बहस की गुंजाइश है और न भाषा और कोई लोकतांत्रिक दबाव ही रहता है ।
6- ब्लॉग खेमेबाजी का शिकार होता दिख रहा है । यह गुटबाजी ब्लॉग भविष्य के लिए ठीक नहीं । यह खेमेबाजी बहसों को खत्म करने या गलत दिशा देने में अपनी खास भूमिका अदा करती है।
7- ब्लॉग के रूप को देखते हुए आप सभी समझ सकते हैं कि लिखने और खुद को उजागर करने कि ऐसी आजादी न कभी देखी-सुनी न ही पाई गई है। आप किसी भी मुद्दे को लिखने और प्रकाशित करने को स्वतन्त्र हैं। किसी भी भाषा, किसी भी शब्दावली में लिखने को आजाद हैं । और यही आजादी ब्लॉग जगत की भाषा को कभी कभी असंयत, गैरजिम्मेदार बना देती है । क्यों कि आप अपने ब्लॉग के लेखक, प्रकाशक और संपादक खुद होते हैं । इसलिए आप हम अपने संपादकीय अधिकारों का दुरूपयोग कर पाते हैं। जिसके चलते अच्छे-अच्छे मुद्दे में भी चौक चौबारे की अर्मयादित भाषा का बोल बाला हो जाता है.
8- इन सारी विसंगतियों के बावजूद ब्लॉग बहस का और अभिव्य़ति का सबसे बड़ा मंच बनेगा, बन भी रहा है। इस आधार पर कह सकती हूँ कि ब्लॉग का भविष्य बहुत अच्छा है। आज जो हिंदी ब्लॉगर्स की संख्या हजारों में है वो कल लाखों में और परसों करोड़ों में पहुँचेगी और ब्लॉगिंग हिन्दी भाषा और साहित्य को भी एक नया मुकाम देगी । साथ ही ब्लॉग की हिन्दी भविष्य की हिन्दी हो के रहेगी । अच्छी और सार्थक बहसें भी हो पाएँगी इसकी पूरी उम्मीद दिख रही है। बस इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात खत्म करती हूँ । मै हिन्दुस्तानी एकेडमी, महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविधालय, सिद्धार्थ त्रिपाठी, संतोष भदौरियाँ, अनूप शुक्ल, ज्ञान जी इन सब को धन्यवाद देती हूँ जिनकी वजह से मैं एक अदना ब्लॉगर अपने विचार यहाँ रख पाई और आप सब ब्लागर्स का भी जिन्होनें मुझे धैर्य से सुना, धन्यवाद।




