गुरुवार, २४ दिसम्बर २००९

उत्सव बना झमेला


खुशी अफसोस में बदल गई

मेरे छोटे भाई की शादी तय हो गई थी। 12 फरवरी को शादी और 14 को रिसेप्सन ओ भी बिना लड़की देखे। कि शादी ही तो करनी है। लड़की से करनी है देखना क्या । मुख्य आधार था लड़की का एक सुघड़ भाभी से तुलना। मेरे भाई ने कहा जब लड़की उन भाभी की तरह है तो मैं कर लूँगा। लड़की एमएससी कर के रिसर्च कर रही है और हायर स्टडी के लिए अमेरिका जा रही है। लड़की फरवरी में अमेरिका जा रही है। दोनों की आपस में बात भी शुरू हो गई थी। जिसमें मेरे भाई ने कहा कि तुम अपना केरियर देखो। फिर भी माँ ने कहा कि तुम लड़की एक बार देख लो। शादी के पहले। शायद माँ के मन ने कुछ भाप लिया था। लड़की अपने भाई और पिता के साथ नोयडा आई और मेरा भाई हैदराबाद से आया अपनी भावी पत्नी को देखने।

मुझे छोड़ कर सभी थे। लेकिन जब मेरे भाई ने लड़की को देखा तो जिन भाभी से उस लड़की की तुलना की गई थी वो उसमें दूर-दूर तक नहीं दिखीं। इतना ही नहीं लड़की के कपड़े अस्त-व्यस्त थे साफ नहीं थे। नए नहीं थे। कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग लड़की को दिखाने आए हैं। यही नहीं लड़की समेत वे सारे लोग बड़े रिजिड और अड़ियल दिखे। भाई फिर खूब उत्साहित था। सज-धज कर तैयार था आखिर उस लड़की से मिलने जा रहा था जो उसके सपनों से जुड़ रही थी।

मिल कर वह बात-व्यवहार और रंग-ढंग से कपड़े-लत्ते से दुखी हुआ। फिर भी भैया के कहने पर वह शादी के लिए मान गया। कि लड़की को देख कर मना नहीं करते। बात सही दिशा में थोड़ी देर चली तो मामला वेन्यू पर आ कर फिर अटक गया। भाई चाहता था कि शादी इलाहाबाद से हो। लेकिन वे लोग लखनऊ से शादी करने पर अड़े रहे। फिर भी मेरे बड़े भाई ने कहा कि सोच लीजिए अगर इलाहाबाद से हो तो अच्छा रहेगा। हम फिर बात कर लेंगे। अगले दिन लड़की के भाई का फोन आया कि शादी लखनऊ से ही होगी और रिसेप्सन भी यहीं से होगा। उनका यह रवैया भाई को ठीक न लगा। हमारी ओर से इलाहाबाद में शादी करने के अलावा और कोई माँग न थी। इस पर वे लोग असहज रूप से पेश आ रहे थे। जिस बात को बड़ी प्यार से मनवाया जा सकता था उस पर वे लोग कुछ ढ़ीठ की तरह डट गए।

और इस के बाद भाई ने शादी से इनकार कर दिया। माँ अभी भी यह चाहती है कि यही शादी हो जाए। उधर से लड़की मेरे भाई को फोन करने लगी। पूरे प्रकरण से परेशान भाई में पहले तो फोन लेने की हिम्मत न रही। फिर उसने बात किया तो लड़की ने पूछा कि क्या गलती हुई। मेरे भाई ने कहा कि मेरी और आपकी शादी लगता है नहीं लिखी है। आपको और अच्छे जीवन साथी मिलेंगे। यह मेरी दुआ है।

अपने इस निर्णय से भाई और मेरा पूरा घर दुखी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को देखने के बाद किसी और कारण से शादी से न करना पड़ा है। हम यह सोच कर परेशान हैं कि आखिर लड़की वालों को कैसा लग रहा होगा।

बाद में सोचने समझने पर समझ में आया कि बिचौलिए हड़बड़ी में थे। उन्होंने दोनों तरफ के लोगों को भरम में रखा। जिसका परिणाम यह निकला कि एक लड़की और एक लड़का बे वजह परेशान हो रहे हैं। दोनों अनायास ही एक दूसरे की नजर से गिर गए हैं। वे लोग अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि शादी क्यों टूटी। और इधर सो कोई उन्हें साफ-साफ यह नहीं कह पा रहा कि उनके अड़ियल बर्ताव से मामला बिगड़ रहा है। जब मैंने भाई से कहा कि तुम्हें लखनऊ बारात लेकर चलने में क्या दिक्कत है। तो वह बोला कि दिक्कत कुछ भी नहीं। बस उनके बोल बचन अच्छे नहीं लगे।

भाई की दुविधा यह है कि जो लड़की फोटो में बहुत अच्छी दिख रही थी वह सामने से इतनी उलट क्यों है। जो ल़ड़की फोन पर इतनी सहज और मीठी थी वह सामने से इतनी उलझी और कठोर क्यों थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके यहाँ कोई आपसी संकट रहा हो। जिसके कारण लड़की को कोई उलझन रही हो। जो भी रहा हो। खामखा का एक संभावित उत्सव झमेले में बदल गया। 12 और 14 फरवरी 2010 मेरे भाई और उस लड़की के लिए एक मनहूस तारीख की तरह दर्ज हो गए हैं। बिचौलिए पति-पत्नी वहीं आपस में भिड़ गए कि मैंने कहा था तैने कहा था। लेकिन अभी इससे क्या। दोनों पक्षों की फजीहत हो रही है।

( यह पोस्ट चोखेर बाली पर भी पढ़ें)

मंगलवार, १५ दिसम्बर २००९

मानस परनानी की गोद में




खोना पाना जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसमें जहाँ हम समय के साथ पुराने लोगों को खोते जाते हैं वहीं नए लोगों को पाते जाते हैं । पाने की खुशी की तरह खोने का दुख भी स्वभाविक है ।

कल 14 .12.09 की शाम मेरी नानी नही रहीं वह 87 वर्ष की थीं। मेरी मौसी ने फोन पर बताया कि उनका खाना पीना कम होता जा रहा था तभी उन्हें लगा इस साल की ठंड पार करना मेरी माँ के लिए बहुत मुश्किल है, वही हुआ भी ।

अपनों के बारे में बताने को बहुत बहुत बातें होती हैं जो कभी खत्म नहीं होतीं ।
अपनी नानी के बारे में कह सकती हूँ कि बिना लाग लपेट के सीधी बात कहतीं थीं।
चौकस निगाह से किसी नए को पढ़तीं थीं। हम सब को ठूँस ठूँस कर खिलाती और खुद भी खाने पीने का ख्याल रखतीं और कहतीं कि रोटी भात ज्यादा ज्यादा नहीं खाना चाहिए । दूध- दही, फल -सब्जी ज्यादा खाना चाहिए जिससे दिमाग तेज रहता है और शरीर चुस्त । जिसका नतीजा नानी में दिखता भी था।

अपनी नानी जी के बारे में यह भी बताना चाहूँगी कि वे मेरी माँ की कहनेभर को सौतेली माँ थीं करने भर में अपनी ही माँ सी प्यारी........।

जब मेरी माँ दो साल की थीं और मेरे मामा पाँच साल के तब मेरी नानी उनको माँ के रूप में मिलीं। माँ बताती रहीं है कि लोगों के बताने, बहकाने पर भी नई माँ में सौतेला पन जैसा कभी कुछ नहीं दिखा। नानी ने माँ को इतना प्यार किया कि हमेशा उन्हें लेकर ही मायके गईं। जब वे पहली बार विदा होकर मायके जाने लगीं तो भी अपने दोनों बच्चों को साथ लेकर ही गईं। हालाकि माँ की ताई जी ने उनसे तब कहा था कि बच्चों को लेकर मायके मत जाओ । यानि मेरे पाँच वर्ष के मामा और 2 साल की मेरी माँ
को। दो बच्चे पहली ही विदाई में अच्छा नही लगेगा । तब मेरी नानी जी ने कहा था कि ये मेरे बच्चे हैं मैं लेकर ही जाऊँगी । मेरी माँ भी नानी से चिपक कर रो रही थीं । नानी ने उन्हें गोद में उठा लिया और तैयार कर अपने साथ ले गईं ।

मेरी नानी ने मेरी माँ और मामा को पाल पोस कर बड़ा किया और शादी की । मेरे मामा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर एच एस सी एल में बतौर इंजीनियर बहाल हुए, मेरी माँ विदा होकर मेरे पिता के पास ससुराल भेज दी गई ।

तब मेरे पिता कोलकाता के सेंटजेवीयर्स में बी एसी के छात्र थे .। मेरे पिता का कारोबार ठीक ठाक रहा तो नानी अपनी बेटी यानि मेरी माँ के भाग्य पर इतरातीं और जब कभी बुरे दिन आए नानी ने मेरे पिता को शंकर जी भोले बाबा की उपाधियाँ भी दी । आखिर मेरी नानी जी को अपनी बेटी की खुशी से ही लेना देना था ।

जब मेरी माँ और मामा जी को बच्चे हुए तब नानी ने अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त हो अपना परिवार किया । जिसमें मेरी एक मौसी और दो मामाओं का जन्म हुआ। मेरी मौसी दिल्ली के कमला विहार महाविद्यालय मे एसोसिएट प्रोफेसर हैं। मेरे दूसरे मामा एक्पोर्ट के व्यापार में हैं और तीसरे मामा डॉक्टर हैं ।

मेरे नाना स्वर्गीय राज वल्लभ ओझा जी 14 साल पहले ही 16 जुलाई 1994 को संसार से विदा ले चुके हैं । वे पत्रकार थे और उन्होंने फिरोज गाँधी के साथ काम किया था। अपनी पत्रकारिता और अपनी हिन्दी से अटूट प्यार करते थे । उन्हें विश्व भ्रमण का शौक था और नाना ने देश दुनियाँ का भ्रमण किया भी । अन्त के दिनों में रशियन ऐमबेसी में रहे। हिन्दी के प्रति प्रेम के चलते ही नानाजी को श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी द्दारा भेंट में साकेत प्रेस इन्क्लेव में एक फ्लैट मिला। मेरे नाना जी की तीन-चार किताबें भी प्रकाशित हुईं जिनमें एक है गेटे के देश में और दूसरी है बदलते दृश्य । बाकी के नाम याद नहीं कर पा रही हूँ।

मेरे नाना-नानी जी की ढेरों बातें मेरी समृति में जुड़ी है । उनमें एक है जब मैं मानस के होने के बाद नानी का आशीर्वाद लेने सपरिवार उनके पास गई। बात 1996 की है। मेरा बेटा मानस तब चार-पाँच महीने का ही था। नानी ने लपक कर उसे गोंद में ले लिया और जब तक मैं रही उसे उन्होंने अपने अंक से उतारा नहीं। मानस के साथ खेलतीं दुलरातीं रहीं । कुछ तस्बीरें मौंसी ने खींच ली थीं जो आज भी मेरे पास हैं । आप उपर की तस्वीर में 13 साल पहले मानस को उसकी अपनी परनानी की गोद में देख सकते हैं। उस दिन का वह पल आज मेरे लिए अमूल्य नीधि हैं।

मै अपनी ही उलझन में आज नानी की अन्त्येष्ठि में न जा सकी। मेरी नानी आज शाम को पंच तत्व में लीन हो गईं हैं। मैं उनसे दूर रह कर उनको अपनी श्रद्धांजलि कैसे दूँ सो नानी के बारे में अपनी बातें लिख कर अपने भाव प्रकट कर रही हूँ। भगवान मेरी प्यारी नानी की आत्मा को शांति दें।

सोमवार, ३० नवम्बर २००९

कोई बड़े कुल में जन्म लेने भर से बड़ा नहीं होता।



कितनी कितनी बातें जो आप सब से बांटना चाहती थी पर

रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच बातें आईं और गईं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं
सभी के साथ होता है ।बेचैनी होती है जब हम चाह कर भी अपनी बात कह नहीं पाते, पर
खुशी होती है तब जब मेरी बात कोई और कह दे। मैं या हम और बेफिक्र हो जाते हैं
कि चलो लोगों तक बात पहुँच गई । अब फिर फिर एक ही बात क्यों । इस उहा-पोह में मैंने देखा अरे आज महीने का आखिरी दिन और एक पोस्ट, बस यही वजह लिख रही हूँ । हालाकि इस बात को मैं ठीक से समझती हूँ कि जहाँ चाह है वहा राह है । अरे वह पीने वाली गरमा गरम चाह नहीं ।
इसी चाह में मैं हरिवंश राय बच्चन की 102 वी जयन्ती के अवसर पर भारती विद्या भवन (चर्नी रोड)पहुँची । वहाँ सभागार में पहुँचते ही सभी दर्शको को नवनीत का बच्चन विशेषांक बांटा गया । दस पन्द्रह मिनट समारोह के इन्तजार के बीच मैंने नवनीत की प्रति उलट पुलट देखी, सोलहवें पेज पर फोटो में हरिवंश राय बच्चन, सुमित्रा नन्दन पंत और पं.नरेद्र शर्मा जी दिखे । नरेद्र जी को देख कर लावण्या जी याद आती रहीं ....
कार्यक्रम शुरू हुआ अमिताभ सपरिवार मंच पर थे जिसमें जया जी, अजिताभ, अभिषेक, ऐश्वर्या, श्वेता, नम्रता, नैना सहित उनकी पारिवारिक मित्र पुष्पा भरती जी भी थीं।
अमिताभ जी ने बीजू शाह के संगीत संगत में हरिवंश जी की कविताओं का पाठ किया। नाच घर और बुद्ध कविता जो पहले भी पढ़ चुकी थी अमिताभ जी से सुनकर फिर प्रिय कर लगी। जया और अमिताभ ने अपना गान मुझे दे दो साथ साथ पढ़ा । फिर बारी बारी से बच्चन परिवार के सभी बच्चों ने छोटी छोटी कविताएं पढ़ीं । जो बच्चन जी ने इन बच्चों के लिए ही लिखी थी।

सभी श्रोता मंत्र मुग्ध सुन रहे थे जिसमें पुष्पा जी ने कुछ संस्मरण सुनाए। साथ ही पुष्पा जी ने यह भी बताया कि वह कक्षा 2 से 12वीं तक अपने स्कूल में हरिवंश राय बच्चन बन कर काव्य पाठ करती थीं और हर बार उन्हें फस्ट प्राइज मिलती कभी सेकेंड नहीं मिली ।पुष्पा जी ने हरिवंश राय बच्चन के जैसे बाने को पाने की जद्दोजहदो को भी बयान किया ।


बच्चन परिवार को मंच पर बैठे देख रही थी, सुन रही थी, सुनते हुए यह सोच रही थी, कि हरिवंश राय बच्चन खुद को कायस्थ (शूद्र?) कहते हैं ।यह तो उनकी बात है, पर सच तो यह लगता है कि वह ही नहीं उनका पूरा कुनबा अपनी करनी से कर्म श्रेष्ठ -कुल श्रेष्ठ है । कर्म ही जाति है

हाँ सभी इन्हें चुपचाप देखते सुनते रहे । सभी के लिए यह सुखद होगा कि सपरिवार एक साथ दिखें । सुख किसे अच्छा नहीं , बच्चन परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ संस्कार भी दिखा । जहाँ अपने बाबू जी को इस तरह से याद किया गया ।और हम भी सहभागी रहे...मेरा मन हुआ इस सुखद शाम को आप सब से बाँटू.. ।बाप तो, बेटा बाप रे बाप, उनका भी बेटा अभिषेक -बंदे ने उन तीन घंटो में ही अपने परिवार और बड़ो के साथ अपने आदर को छोटी छोटी हरकतों से बताया । तेजी जी , जया जी ने परिवार को कुनबा बना कर दिखाया है । अब बारी विश्व सुन्दरी ऐश्वर्या की जो अपने परिवार को और किस ऊँचे मुकाम तक ले जाती हैं। उम्मीद है बड़े कलाकार का बड़ा परिवार ऐसे ही बड़ा बना रहे..........

शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

ब्लॉग की हिंदी भविष्य की हिंदी हो के रहेगी


इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन में बहुत कुछ पाया

इलाहाबाद ब्लॉगिंग संगोष्ठी में जाने से पहले ही हमारी बनारस की घरेलू यात्रा तय हुई थी, यात्रा सुनिश्चित होना ही था कारण यहाँ मुम्बई मे दीवाली की पंद्रह दिन की बच्चों की छुट्टियाँ, फिर उधर यूपी में न सर्दी होगी न गर्मी। बच्चे सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की स्थिति बन गई । तभी पता चला कि इलाहाबाद में ब्लॉगिंग संगोष्ठी भी उन्हीं दिनों तय की गई है । कुल मिला कर मुझे निमंत्रण मेल मिला और मैं संगोष्ठी की भागीदार बनीं।
मुझे खुशी इस बात की थी कि क्या अच्छा मौसम है, बच्चों की छुट्टी और संगोष्ठी साथ-सा। लेकिन इतना तो तय है यदि छुट्टी न होती तो मैं इस ब्लॉगिंग संगोष्ठी में चाह कर भी न होती । खैर बुलाया तो बुलाया, गई तो गई ।

अब बात मुद्दे की । इलाबाद पहुँचने के पहले मैने मेल में मिले आठ मुद्दों में से एक
आखिरी या आठवाँ अभिव्यति की उन्मुक्तता पर बोलना तय किया। और बिंदास होकर अपने प्रयाग राज में दो दिनों के लिए पैर जमाया ताकि जम कर अपनी बात कहूँ और यह मौका न चूकने के जोश के साथ के साथ बातों को रखूँ।
लेकिन इलाहाबाद पहुँच कर बोलना पड़ा ब्लॉग पर बहस के मुद्दे और भाषा । इस अचानक तय मुद्दे पर बरबस बोल गई अई हो दादा...क्या करूँ । फिर जवाब भी खुद ब खुद मिला करूँ क्या डटूँ बहस के मुद्दे पर। जो जँचे
लिख डालूँ
पढ़ डालूँ या
मुझे जो लगा किया अब जिसे जो लगे सो करे
पढ़े या कहे धत्त जाने दे ...
फिर वहाँ ऐसा भी माहौल बनने लगा जैसे अक्सर एक दूसरे की पोस्ट पर बेवजह विपरीत माहौल बन जाता है, पर जो कहना था सो कहा।

मैंने अपना वक्तव्य इन शव्दो मे रखा
मित्रों अभिव्यति की स्वतन्त्रता राजा राम के समय से है तभी किसी एक के कहने पर जनक-दुलारी सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी, सो मुझे भी अपनी बात कहने दें । बाद में टोका टाकी करें । और मुझे लगेगा कि उत्तर देना उचित है तो दूँगी वर्ना आप सब मुझे माफ करेगें, सचमुच सभी ब्लॉगर मित्रों ने धैर्य से सुना इसके लिए उनकी आभारी हूँ

ब्लॉग पर बहस के मुद्दे और भाषा

1-मेरा मानना है कि ब्लॉग बहस की दुनियाँ नही है,वास्तविकता यह है कि हिन्दी समाज में बहस एक सीरे से गायब है लोग बहस नहीं करते बल्कि अपने फैसले सुनाते हैं साथ ही इस अंदाज में पेश आते हैं कि मै महान तू नादान , मैं सही तू गलत। ऐसे माहौल में क्या किसी समाज में चाहे वह ब्लॉग ही क्यों न हो बहस कैसे हो पाएगी और जो बहस होगी भी वह एक तरफा होगी। पूर्वाग्रह से ग्रस्त होगी, और जो थोड़ी बहुत बहस है भी वह बेनामी ब्लॉगर्स की वजह से हमेशा एक गलत दिशा ले लेती है। यह छुपे हुए लोग अपनी दुश्मनियाँ अपनी खुन्नस निकालते हैं
2- मेरा मानना है कि अगर बहस करनी हो तो एक खास ब्लॉग बने, मुद्दे तय किए जाएँ मुद्दे सुझाए जाएँ फिर बहस एक मुकाम पर जाए ताकि ब्लॉग को एक खास पहचान मिले।
3-वैसे भी ब्लॉग अब पहचान का मोहताज नहीं इसका प्रमाण यह इतना बड़ा आयोजन ही है । लेकिन अफसोस है कि ब्लॉग पर बड़े से बड़ा मुद्दा पुराना और उबाऊ हो जाता है। लोग हर दिन नई बात ढ़ूँढते हैं । एक ही बात को लेकर चलना ब्लॉग का स्वभाव नहीं है।
4- ब्लॉग बोले तो बहता पानी । हर पल चढ़ाई गई पोस्ट किसी भी बहस को धूमिल करती जाती है ।
5- जो लोग बहस करते भी हैं वह बेसिकली सामने वाले ब्लॉगर के संहार और सामाजिक हत्या के प्रयास में लगे रहते हैं । न तो उनके यहाँ बहस की गुंजाइश है और न भाषा और कोई लोकतांत्रिक दबाव ही रहता है ।
6- ब्लॉग खेमेबाजी का शिकार होता दिख रहा है । यह गुटबाजी ब्लॉग भविष्य के लिए ठीक नहीं । यह खेमेबाजी बहसों को खत्म करने या गलत दिशा देने में अपनी खास भूमिका अदा करती है।
7- ब्लॉग के रूप को देखते हुए आप सभी समझ सकते हैं कि लिखने और खुद को उजागर करने कि ऐसी आजादी न कभी देखी-सुनी न ही पाई गई है। आप किसी भी मुद्दे को लिखने और प्रकाशित करने को स्वतन्त्र हैं। किसी भी भाषा, किसी भी शब्दावली में लिखने को आजाद हैं । और यही आजादी ब्लॉग जगत की भाषा को कभी कभी असंयत, गैरजिम्मेदार बना देती है । क्यों कि आप अपने ब्लॉग के लेखक, प्रकाशक और संपादक खुद होते हैं । इसलिए आप हम अपने संपादकीय अधिकारों का दुरूपयोग कर पाते हैं। जिसके चलते अच्छे-अच्छे मुद्दे में भी चौक चौबारे की अर्मयादित भाषा का बोल बाला हो जाता है.
8- इन सारी विसंगतियों के बावजूद ब्लॉग बहस का और अभिव्य़ति का सबसे बड़ा मंच बनेगा, बन भी रहा है। इस आधार पर कह सकती हूँ कि ब्लॉग का भविष्य बहुत अच्छा है। आज जो हिंदी ब्लॉगर्स की संख्या हजारों में है वो कल लाखों में और परसों करोड़ों में पहुँचेगी और ब्लॉगिंग हिन्दी भाषा और साहित्य को भी एक नया मुकाम देगी । साथ ही ब्लॉग की हिन्दी भविष्य की हिन्दी हो के रहेगी । अच्छी और सार्थक बहसें भी हो पाएँगी इसकी पूरी उम्मीद दिख रही है। बस इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात खत्म करती हूँ । मै हिन्दुस्तानी एकेडमी, महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविधालय, सिद्धार्थ त्रिपाठी, संतोष भदौरियाँ, अनूप शुक्ल, ज्ञान जी इन सब को धन्यवाद देती हूँ जिनकी वजह से मैं एक अदना ब्लॉगर अपने विचार यहाँ रख पाई और आप सब ब्लागर्स का भी जिन्होनें मुझे धैर्य से सुना, धन्यवाद।

शुक्रवार, ३० अक्तूबर २००९

इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन से क्या मिला



बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया

यह अक्टूबर का महीना बड़ा अच्छा रहा। इसमें बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया। खोया यह कि मुंबई के स्कूल रायन इंटर नेशनल में जज बना कर बुलाई गई। हालाकि अचानक खाँसी बुखार से तबियत खराब हो जाने के कारण न जा सकी। खोया यह भी कि मेरे एक कान की बाली कहीं यात्रा की तैयारियों में खो गई। जो एक बची है उसे देख -देख कर दुखी हो रही हूँ। वहीं पाया यह कि इलाहाबाद के ब्लॉगर सम्मेलन में न जाते-जाते पहुँच गई।

मेरा वहाँ पहुचना तो असम्भव था। न मैं बड़ी ब्लॉगर हूँ न लिक्खाड़। यह मेरा पहला ब्लॉगर मीट था जो मेरे लिए एक बड़ी घटना है। वहाँ जो कुछ बोल पाई बोल भी दिया। । उस भाषण में मुझे सबसे अधिक उलझन इस बात की है कि मैंने आयोजकों को किसी भी तरह का आभार वचन नहीं कहा। हालाकि ब्लॉगर बंधुओं ने धीरज से सुन कर मेरा हौसला बढ़ाया और प्रतीक चिह्न सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के कारण मुझे बाद में मिल पाया। मैं उनकी संतोष भदौरिया और अनूप शुक्ल की आभारी हूँ। जिनके चलते मुझे यह सुवसर मिला।

वहाँ कितने ऐसे लोगों से भेट मुलाकात हुई जिन्हें पिछले तीन सालों से ब्लॉग पर देखती- पढ़ती आ रही हूँ। मुझे बचपन से लोगों से मिलना अच्छा लगता रहा है । वह आदत गई नहीं है। सो लोगों से मिल कर खुश हूँ। खुश हूँ कि ज्ञान भाई, अनूप जी, अजित बडनेकर जी, प्रियंकर जी, अफलातून जी, रवी रतलामी जी, मसिजीवी, मनीषा समेत बहुत सारे प्रिय ब्लॉगरों से मिलना हुआ। मैं यहाँ जिनका नाम नहीं ले पा रही हूँ वे मान लें कि मैं उनसे मिल कर खुश हूँ।


इलाहाबाद के इसी सम्मेलन में अपने मुंबई के पड़ोसी युनूस भाई से मिलना अच्छा लगा। वहाँ सोचा था उनके साथ जा कर बतरस वाली ममता जी से मिल लूँगी। लेकिन यह न हो सका । ममता को उनके माता जी के निधन पर केवल फोन से सांत्वना दे पाई हूँ।


इलाहाबाद के इस अधिवेशन को मैं जीवन में कभी भी भूल न पाऊँगी। हालाकि मैं यह ठीक से जानती हूँ कि मैं उतनी प्रतिभाशाली नहीं जितने प्रतिभाशाली ब्लॉगर वहाँ जुटे थे। मुझे इस बात का भी मलाल है कि कई सारे प्रतिभाशाली ब्लॉगर वहाँ न पहुँच सके। वे भी आते तो सुनने और समझने का संयोग होता। लेकिन क्या यह संभव है कि कोई आयोजन बिना सवालों के घेरे में आए पूरा हो सके। यह तो रीति है। सामाजिक आयोजन तो अपनी जगह हैं। लोग तो बेटे-बेटियों के विवाह तक में बहुत सारे अपनों को बुलाना भूल जाते हैं।


इलाहाबाद में जो कुछ विचार मैंने व्यक्त किए उसे छाप कर आप सब को पढ़वाऊँगी।

बुधवार, ३० सितम्बर २००९

भविष्य का स्वागत करती हूँ

घर में अकेली हूँ। बच्चे पापा के साथ घूमने गए हैं। मैं न गई। अधकपारी से सिऱ फटा जा रहा है। चाय चढ़ा कर भूल गई। जब जलने की महंक आई तो दौड़ कर किचेन में गई। सब कुछ जल चुका था। चूल्हा बुझा कर लौट आई। चाय पीने का मन है लेकिन बनाने का मन नहीं है। सोच रही हूँ कोई देवरानी जेठानी या सास या बहन भाई साथ में होते तो चाय कब की मिल चुकी होती । शाम हो रही है। अंधेरा शहरों में वैसा गाढ़ा कभी नहीं हो पाता जैसा गाँवों में होता है। यहाँ सूरज के उगने और डूबने का पता ही नहीं चलता। शाम होते ही बत्तियाँ जल पड़ती हैं। बत्तियाँ जला कर बैठी हूँ। कुछ करने का मन है।

एक थका सा उपन्यास पढ़ रही हूँ लेकिन उसकी कहानी ही नहीं खिसक रही है। नहीं लगता कि यह किताब मुझसे पढ़ी जाएगी। आधी अधूरी पढ़ कर छोड़ी गई किताबों में एक किताब और जुड़ने जा रही है। सोच रही हूँ बाहर निकलूँ तो शायद अच्छा लगे। लेकिन अभी घंटी बजेगी। अभी बच्चे लौट आएँगे। अब तो उनके आने के बाद ही कुछ कर पाउँगी। लेकिन उनके आते ही तो धमा चौकड़ी शुरू हो जाएगी। जीवन का मीठा खेल फिर शुरू हो जाएगा। कई पैरों के सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज आ रही है। बेटी कितने जोर से काँय-काँय कर रही है। निर्भय निरदुंद....मैं उनके घंटी बजाने का इंतजार नहीं कर सकती। बच्चे बाहर दरवाजे की तरफ आ रहे हों तो रुका नहीं जा सकता। चलती हूँ...भविष्य का स्वागत करती हूँ।

रविवार, ३० अगस्त २००९

सुनती हूँ यह सब डरी हुई

बहुत दिनों बाद कोई कविता छाप रही हूँ। कुछ मित्रों को सुनाया तो इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। फिलहाल इसे कुछ और कविताओं के साथ जयपुर के एक अखबार डेली न्यूज में छपने के लिए भेज दिया है। उसके पहले यहाँ पढ़ें।

सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुई

मैं बाँझ नही हूँ
नहीं हूँ कुलटा
कबीर की कुलबोरनी नहीं हूँ ।

न केशव की कमला हूँ
न ब्रहमा की ब्रह्माणी
न मंदिर की मूरत हूँ।

नहीं हूँ कमीनी, बदचलन छिनाल और रंडी
न पगली हूँ, न बावरी
न घर की छिपकली मरी हुई
फिर भी
मैं सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुई।

नींद में सुनती हूँ गालियाँ दुत्कार
मुझे दुत्कारता यह
कौन है ....कौन है ......कौन है.....
जो देता है सुनाई
पर नहीं पड़ता दिखाई
हर तरफ छाया बस
मौन है मौन है मौन है।