शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

बस थोड़ा आस्था वाद

बस थोड़ा आस्था वाद। संयम भारतीय संस्कृति की आत्मा है।यदि पेड़ कहे कि मै जमीन पर क्यों बधा हूँ मुझेउड़ने दो तब तो वह पेड़ मर जाएगा।पेड़ भी जड़ों से बधा है तभी जीवित है।नही तो उसका अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा।अगर पहाड़ों का पानी सभी दिशाओं में बहने लगे तो बहाव असम्भव हैपानी एक खास बहाव पर ही बहता है।नदी दो किनारो से बधी है यदि वह कहे मुझे बंधन मुक्त करो, तो पानी और नदी कुछ न रह जाएगा सब सूख जाएगा।

संयम को तुच्छ मत समझो। नदी अपनी गहराई और गभीरता के कारण ही, बंधन के कारण ही हमारे लिए पूज्य है. संयम समाज , परिवार सब के लिए सही राह है।

पर समय इतना बुरा है कि किसी को मान दो तो भी वह बदले में अपमान देकर खुश हो लेता है। दंभी जीव के ढ़ग निराले मेरे भैया। ऐसा सोचने के सीवा कुछ सोचना भी उस दंभी के दंभ को बढ़ावा देना है।

पर शुक्र है सृष्टि का की सूरज प्रकाश देता है,बादल पानी देता है, पेड़ फल देते है, स्कूल शिक्षा देते हैं । अपना जीवन इन्ही की सेवा में रहना ही हमारा धर्म है।

बहुत से कम बुध्दि, संयम का मजाक उड़ाते हैं और यह कहते पाए जाते है कि मुझे बंघन में नही रहना. पर सच तो यह है की जीवन का सुख बंधन में ही है ।

जैसे नदी संयम में रह कर समुद्र मे मिल जाती है वैसे ही संयम और, बघन में रह कर मनुष्य भी बड़ा बन जाता है।

6 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

यकीनन संयम से ही सफलता मिलती है....."

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

sunder prastuti.

M VERMA ने कहा…

जैसे नदी संयम में रह कर समुद्र मे मिल जाती है वैसे ही संयम और, बघन में रह कर मनुष्य भी बड़ा बन जाता है।
सार्थक बात ... संयम से क्या नहीं हासिल हो सकता है

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
कोटि-कोटि नमन बापू, ‘मनोज’ पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

संयम करने से कितनी समस्यायें स्वतः हल हो जाती हैं।

अभिषेक ओझा ने कहा…

सत्य वचन !