गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

वेलेंटाइन डे और शकुन्तला

रोने से नहीं लड़ने से बनती है बात

शकुन्तला देश की कुछ पहली प्रेमिकाओँ में है...उसके पहले उर्वशी और दमयंती को भी रखा जा सकता है। आज मैं यहाँ शकुन्तला के पत्नी या भार्या संबंधी विचारों को रख रही हूँ जो उसने दुष्यंत के दरबार में न पहचाने जाने पर कहे।

न पहचाने जाने पर शकुंतला लज्जा और दुख से एकदम भूमि में गड़ गई। लेकिन वह चुप हो जानेवाली स्त्री नहीं थी। उसने दुष्यंत को स्त्री के महत्व पर एक पूरा लेक्चर दे डाला। शकुंतला ने भरे दरबार में कहा

सम्राट अब तुम अपने को अकेला मानते हो, क्या तुम्हें हृदय में रहनेवाले उस पुराण मुलि काम का स्मरण नहीं रहा जो सबके पाप कर्म को जानता है। मैं स्वयं तुम्हारे पास आई हूँ...यह जानकर तुम मुझ पतिव्रता का अपमान न करो। पूजा की पात्र पत्नी का सम्मान न करके उलटे तुम उसको सभा में अपमानित करते हो। यह कदापि उचित नहीं है। मैं अरण्य रोदन नहीं कर रही। क्या तुम मेरी बात नही सुन रहे।

यदि तुम मुझे स्वीकार न करोगे तो हे दुष्यंत तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएँगे....

शकुंतला की बात पर दुष्यंत ने उसे ,उसकी माँ मेनका और पिता विश्वामित्र को जम कर गालियाँ दी लेकिन शकुन्तला ने उसे मुँह तोड़ उत्तर दिया।

तुम मेरी भूल का तिनका देखते हो अपनी गलती का ताड़ नहीं दिखाई देता।
राजन पति ही पत्नी के द्वारा स्वयं पुत्र रूप में जन्म लेता है....यही भार्या का भार्यात्व है। भार्या मनुष्य का आधा भाग है....भार्या श्रेष्ठतम सखा है....भार्या त्रिगर्त का मूल है...भार्या के साथ ही गृहमेधी लोग क्रियावान होते हैं। जो भार्यावान हैं उन्हीं के जीवन में आमोद प्रमोद है....प्रिय वादिनी भार्या एकांत में मित्र, दुख में माताऔर धर्म कार्यों में पिता होती है....यदि साथ में स्त्री हो तो मार्गस्थ मनुष्य को जंगल में भी विश्राम मिलता है...
हे दुष्यंत इस कारण विवाह उत्तम धर्म है।

अपने पुत्र की माता अर्थात निज भार्या को माता के समान आदर दें...भार्या से उत्पन्न पुत्र दर्पण में प्रतिबिंबित आत्मा के समान है जिसे देखने से सुख मिलता है। स्त्रियाँ संतति के जन्म का सनातन और पवित्र क्षेत्र हैं...ऋषियों की भी क्या शक्ति है जो स्त्री के बिना संतान उत्पन्न कर सकें...

यहाँ मैं आज की तमाम शकुन्तलाओं से केवल यह कहना चाहूँगी कि यदि उनके दुष्यंत भूलने नाम की बीमारी के शिकार हों तो उन्हें ठीक से सबक दें। चुप हो कर सुबकने-रोने और अकेले मरने से बात न तब बनी थी न आज बननी. है......दरबार निकलते समय शकुन्तला के स्वाभिमान से भरे ये वचन याद रखने लायक हैं...
हे दुष्यंत यदि तुम्हें झूठ ही से प्रेम है तो मैं जाती हूँ.....तुम्हारे जैसे झूठे के साथ मेरा कोई मेल नहीं...और यह याद रखना कि तुम्हारे बिना बी मेरा यह पुत्र इस पृथ्वी का पालन करेगा.....चक्रवर्ती बनेगा।
हार कर दुष्यंत को शकुन्तला और उसके बेटे को अपना ही पड़ा और अंत अच्छा रहा...आप भी अच्छे अंत के लिए प्रेम करें...लेकिन बात बिगड़ जाने पर हिम्मत न हारे....दुष्यंत को भागने और बचने का मौका न दें...

9 टिप्‍पणियां:

चंद्रभूषण ने कहा…

दूसरी शादी करने गए ऐसे ही एक दुष्यंत हाल में दिल्ली में ही शकुंतला के हाथों चप्पलों से पिटे हैं जबकि लखनऊ में एक मंत्रीपुत्र दुष्यंत ने विवाह मंडप में शकुंतला और उसकी मदद के लिए गए पत्रकारों को भी पिटवा दिया। आपका आह्वान सफल हो, इसकी कामना करता हूं।

मनीषा पांडेय ने कहा…

हां, लड़ने से ही‍ बनती है बात और दुष्‍यंत छोड़कर चला भी जाए, तो उसके नाम को रोने के बजाय अपनी नई जिंदगी शुरू करनी चाहिए। और जो इस तरह से छोड़कर चला जाए, वो शायद चले जाने के ही लायक है। और उस नालायक के लिए भला आंसू क्‍या बहाना।

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

बात आपकी सही है.वैसे शकुन्तला और उर्वशी के पहले देवयानी का प्रसंग भी है

Gyandutt Pandey ने कहा…

भूलने की बात पर कहूं - मुझे याद ही न था कि आज वेलेण्टाइन दिवस पर पत्नीजी से विशेष रूप से स्नेह सिक्त वार्तालाप या फूल/बुके प्रस्तुत करना चाहिये।
यह तो इतनी पोस्टें देखने पर ज्ञान चक्षु खुल रहे हैं। :-)

sunita (shanoo) ने कहा…

बिलकुल सही बात कही है आपने घबरा कर मुह फ़ेर लेना कायरता की निशानी है...

सुजाता ने कहा…

बहुत सही लिखा आभा आपने ।पर यह भी देखिये कि स्त्री इस तरह ज्ञान और बोध के लिए पलायन करना चाहें तो क्या हम सब करने देंगे । शायद यह बात ही गले न उतरेगी । मेरा तो खूब मन होता है । पर जो माया जाल खुद ही फैलाया है उसे छोड जाऊँ इतनी भी बेदिल नही । और क्यूँ गृहस्थी में रह कर बोध प्राप्त नही हो सकता ।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

हाय री किस्मत!!
इहां शकुंतला तो क्या उर्वशी और रंभा भी नई है अपनी लाईफ में तो फ़िलहाल कुछ नई कह सकते!!

Udan Tashtari ने कहा…

सही सत्य चौखी बात

आशीष ने कहा…

पढ़कर मजा आ गया, ऐसी ही शकुंतला चाहिए