गुरुवार, 24 जुलाई 2008

नेताओं की नंगई देखेगी जनता जल्द


नेताओं की नंगई देखेगी जनता जल्द .....
कुछ ही महीनों मे देश में आम चुनाव होगें, हमेशा की तरह जनता-नेता की कुर्सी पोछ- पाछ कर बैठाती आई है वैसे ही सही गलत का फैसला होने पर उतारती भी है। जहाँ तक
सीपीएम का सवाल है उसने अपना चेहरा ठीक से दिखा दिया । सोमनाथ जी को
पार्टी से निष्कासित करने के उनके फैसले के बाद अब उनकी यानि लेफ्ट की बात करना कोई मायने नहीं रखता
हाँ.. जिन्हें करना हो करें ।
बीजेपी जनता को गुमरगह करने की कोशिश में माहिर है इसका सबूत हमारे पास 92 का 6 दिसम्बर है...जिसे हम या कोई जिसने सिर्फ समाचार में देखा-सुना पर जिन घरों , जिन लोगों को उस खूनी खेल ने भुगता उनके घर वाले ही बीजेपी की राजनीति को समझ सकते हैं ठीक से.... यह अलग बात है कि किसी के लिए देश भक्त हो सकती है यह पार्टी....
यह देश भक्ति फिर दिखी जब नोटों की गड्डियाँ वे संसद मे लहरा रहे थे, और हम शर्मिंदा हो रहे थे अपने -अपने घरों में, साथ ही अपने को समझा रहे थे कि यदि खरीद फरोख्त जैसा कुछ हुआ भी था तो इन्हें स्पीकर सर को खबर करनी थी और साथ ही यह भी समझ आ रहा था कि यह इनकी 6 दिसम्बर की चाल तो नहीं, खैर जो कुछ हुआ ठीक नहीं रहा पर हम जनता हैं हम सही – सही और गलत - गलत साफ जानना चाहते हैं ।
वैसे ही जैसे आरूषी हत्या काण्ड का सबूत साबित हुआ, यह अलग बात है कि आरूषी की हत्या जिसे मेरी साढ़े तीन साल की बेटी भानी अरूषी दीदी कहने लगी .... लोगों के मन में अब भी सवाल लिए खड़ी है, दूसरी ओर देश की सबसे बड़ी जाँच व्यवस्था पर सवाल उठाता गलत है ऐसा मन कहता है । भरोसे पर दुनिया कायम है तो हमें इस बड़ी और सच के आखिरी सबूत वाली जाँच व्यवस्था को मानना ही होगा, हमने मान लिया और शान्ति भी मिली है - मन को, क्यों न मिले भी आखिर एक पिता की मर्यादा कलंकित होते होते बची है....
यह अलग बात है कि अरूषी की मौत ने भरोसे को झकझोर दिया है ....
अब वैसे ही हम जानना चाहते है इस खरीदी सांसद को, क्या सही है क्या गलत समझाना होगा हम जनता को, आगे सब जनता तय करेगी हमेशा की तरह.......
भरोसा
भरोसा किसी चिड़िया का नाम
होता तो अच्छा था......
फिर हम बच्चों से
,या

...,

हम कहते, वो देखो वो
कितनी कितनी ऊपर
ऊड़ती भरोसा चिड़िया,
फिर बच्चे खुश होते ,
देख देख हम खुश होते इन
बच्चो को ...देख देख,
हम कहते
बच्चो से, देखो यह भरोसा चिड़िया
कैसे दाना चुगते चुगते फुर्र हो जाती है।
या नाम होता किसी इन्सान का ,
हम पूछते नाम और कोई कहता मेरा नाम भरोसा....,
हा सुना भी है नाम- जैसे राम भरोसे
हो सकता है, पूर्वजों ने रखा हो नाम, कि राम ही
करेगें उद्धार ......

पर यह भरोसा न कोई चिड़िया है
न है कोई इन्सान या फिर
जानवर भी
यह तो है एक व्यवस्था का नाम
जिस पर कायम होता है
हमारा...
बहुत कुछ या सब कुछ ....

7 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

पर यह भरोसा न कोई चिड़िया है
न है कोई इन्सान या फिर
जानवर भी
यह तो है एक व्यवस्था का नाम
जिस पर कायम होता है
हमारा...
बहुत कुछ या सब कुछ

--एक बहुत उम्दा पोस्ट. जायज मांग है एक जागरुक नागरिक होने के नाते.

Gyandutt Pandey ने कहा…

सही है जी - भरोसा वह रोटी है जिसे सांसद न खाता है, न बेलता है, वह सिर्फ उससे खेलता है (संदर्भ धूमिल की कविता)।

Ila's world, in and out ने कहा…

नेताओं की नंगई तो हम सब २२ जुलाई को देख चुके हैं.शर्म तो खुद पर आ रही है कि भरोसा कैया उन लोगोम पर जो हमारे पेथ प्रदर्शक नही,उन्हें तो व्यापारी भाषा आती है जहां उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना मुनाफ़ा चाहिये बस.
आभाजी सामयिक और सारगर्भित पोस्ट के लिये बधाई.

अभिषेक ओझा ने कहा…

जायज चिंता है... वैसे फिर वही होगा जो होता आया है...

इंतज़ार कीजिये १० साल जब तक मैं राजनीती में नहीं आ जाता :-)

Sanjay Sharma ने कहा…

भरोसा तो हर पार्टी ने खोया है . गरीबों के रहनुमा का दंभ भरने वाली कम्युनिस्ट पार्टी के जीवित रहते 'गरीबों दलितों के नाम पर कई राजनितिक दल का गठन हुआ .नए जन्मे ये क्षेत्रीय पार्टी पुरानी [ पार्टी } कम्युनिस्ट से कहीं ज्यादा सफल किस भरोसे होती गई .किसी ने भरोसा तो तोडा ही होगा .
जनता को भरोसा करने ,और भरोसा टूटने के कई आधार मनगढ़ंत दिए जाते है .इसी कारण न तो मजबूत भरोसा होता है फलतः टूटते देर भी नही लगती .

जनता को भी सोचना होगा . पिछले १५ साल से एक भी मजबूत सरकार देने में नाकाम जनता क्या हिसाब लेगी अपने टूटे या जुड़े विश्वास का ?

बाल किशन ने कहा…

कड़वी सच्ची और क्या?
देख लेंगे और क्या?
देख ही रहे हैं और क्या?

अभय तिवारी ने कहा…

बढ़िया है.. पढ़ना,सोचना, लिखना जारी रहे!