सोमवार, 30 नवंबर 2009

कोई बड़े कुल में जन्म लेने भर से बड़ा नहीं होता।



कितनी कितनी बातें जो आप सब से बांटना चाहती थी पर

रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच बातें आईं और गईं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं
सभी के साथ होता है ।बेचैनी होती है जब हम चाह कर भी अपनी बात कह नहीं पाते, पर
खुशी होती है तब जब मेरी बात कोई और कह दे। मैं या हम और बेफिक्र हो जाते हैं
कि चलो लोगों तक बात पहुँच गई । अब फिर फिर एक ही बात क्यों । इस उहा-पोह में मैंने देखा अरे आज महीने का आखिरी दिन और एक पोस्ट, बस यही वजह लिख रही हूँ । हालाकि इस बात को मैं ठीक से समझती हूँ कि जहाँ चाह है वहा राह है । अरे वह पीने वाली गरमा गरम चाह नहीं ।
इसी चाह में मैं हरिवंश राय बच्चन की 102 वी जयन्ती के अवसर पर भारती विद्या भवन (चर्नी रोड)पहुँची । वहाँ सभागार में पहुँचते ही सभी दर्शको को नवनीत का बच्चन विशेषांक बांटा गया । दस पन्द्रह मिनट समारोह के इन्तजार के बीच मैंने नवनीत की प्रति उलट पुलट देखी, सोलहवें पेज पर फोटो में हरिवंश राय बच्चन, सुमित्रा नन्दन पंत और पं.नरेद्र शर्मा जी दिखे । नरेद्र जी को देख कर लावण्या जी याद आती रहीं ....
कार्यक्रम शुरू हुआ अमिताभ सपरिवार मंच पर थे जिसमें जया जी, अजिताभ, अभिषेक, ऐश्वर्या, श्वेता, नम्रता, नैना सहित उनकी पारिवारिक मित्र पुष्पा भरती जी भी थीं।
अमिताभ जी ने बीजू शाह के संगीत संगत में हरिवंश जी की कविताओं का पाठ किया। नाच घर और बुद्ध कविता जो पहले भी पढ़ चुकी थी अमिताभ जी से सुनकर फिर प्रिय कर लगी। जया और अमिताभ ने अपना गान मुझे दे दो साथ साथ पढ़ा । फिर बारी बारी से बच्चन परिवार के सभी बच्चों ने छोटी छोटी कविताएं पढ़ीं । जो बच्चन जी ने इन बच्चों के लिए ही लिखी थी।

सभी श्रोता मंत्र मुग्ध सुन रहे थे जिसमें पुष्पा जी ने कुछ संस्मरण सुनाए। साथ ही पुष्पा जी ने यह भी बताया कि वह कक्षा 2 से 12वीं तक अपने स्कूल में हरिवंश राय बच्चन बन कर काव्य पाठ करती थीं और हर बार उन्हें फस्ट प्राइज मिलती कभी सेकेंड नहीं मिली ।पुष्पा जी ने हरिवंश राय बच्चन के जैसे बाने को पाने की जद्दोजहदो को भी बयान किया ।


बच्चन परिवार को मंच पर बैठे देख रही थी, सुन रही थी, सुनते हुए यह सोच रही थी, कि हरिवंश राय बच्चन खुद को कायस्थ (शूद्र?) कहते हैं ।यह तो उनकी बात है, पर सच तो यह लगता है कि वह ही नहीं उनका पूरा कुनबा अपनी करनी से कर्म श्रेष्ठ -कुल श्रेष्ठ है । कर्म ही जाति है

हाँ सभी इन्हें चुपचाप देखते सुनते रहे । सभी के लिए यह सुखद होगा कि सपरिवार एक साथ दिखें । सुख किसे अच्छा नहीं , बच्चन परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ संस्कार भी दिखा । जहाँ अपने बाबू जी को इस तरह से याद किया गया ।और हम भी सहभागी रहे...मेरा मन हुआ इस सुखद शाम को आप सब से बाँटू.. ।बाप तो, बेटा बाप रे बाप, उनका भी बेटा अभिषेक -बंदे ने उन तीन घंटो में ही अपने परिवार और बड़ो के साथ अपने आदर को छोटी छोटी हरकतों से बताया । तेजी जी , जया जी ने परिवार को कुनबा बना कर दिखाया है । अब बारी विश्व सुन्दरी ऐश्वर्या की जो अपने परिवार को और किस ऊँचे मुकाम तक ले जाती हैं। उम्मीद है बड़े कलाकार का बड़ा परिवार ऐसे ही बड़ा बना रहे..........

29 टिप्‍पणियां:

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

सच बात है !!
अपने संस्कारों से ही व्यक्ति की पहचान होती है ....बहुत बढ़िया नजरिये से मई यही कह सकता हूँ की यदि यह संस्कार बच्चन परिवार में ना होते तो शायद ही वह इतनी उचाई पर जा पहुंचता ?

मुझे बच्चन परिवार में फ़िल्मी खूबियों से ज्यादा बड़ी खूबी यही दिखती है |

इसी खूबी को रेखांकित करने के लिए आभार!!

Pandit Kishore Ji ने कहा…

bahut badiya likha hain aapne

संगीता पुरी ने कहा…

जहां तक मेरा मानना है कायस्‍थ शूद्र नहीं होते हैं .. वैसे वास्‍तव में बडा या छोटा कुल से नहीं होता .. खासकर भारत में जितने भी प्रकार की कला विकसित हुई हैं .. वे शूद्रों के द्वारा की गयी हैं .. और कला के लिए सही भावना का होना बहुत आवश्‍यक है .. इसलिए उनकी अच्‍छी भावनाओं से तो इंकार नहीं किया जा सकता .. अब धन को जुटाने वाले गृहस्‍थों ने उन्‍हें उनके कार्य के अनुरूप सम्‍मान नहीं दिया .. और उनकी रोजी रोटी की अच्‍छी व्‍यवस्‍था नहीं की .. और उनको कमजोर मान लिया गया .. तों इसमें समाज को दोष है .. भला शूद्रों का क्‍या दोष ??

आभा ने कहा…

संगीता जी प्रणाम , हां कायस्थ शूद्र नहीं होते बल्कि वैश्य होते है यही बात अब तक मैं भी जान रही थी बल्कि अब भी यह बात मानने में उलझन में हूँ ।यह तो हरिवंश राय बच्चन जी खुद कह रहे हैं , नवनीत के बच्चन विशेषांक नवम्बर 09 के पेज न. 52 में देखे। इस महान कवि लेखक को कायस्थ की उत्पत्ति के बारे में सही सही पता हो.आप की बाकी सारी बातों से मैं भी सहमत हूँ

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अरे आपका ब्लाग तो देखा ही नहीं था।

बच्चन जी तकदीर वाले थे…नेहरु के सखा…बेटा इतना बडा हीरो…पद-प्रतिष्ठा-मान सब तो था उनके पास तो मरने के बाद भी स तरह याद कर लिया जाता है वरना कौन मनाता है हिन्दी के कवि का जन्मदिन्…बहुतों की याद आ रही है…शील,धूमिल,विकल्…

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सही कहा है आपने अगर बड़े कुल में पैदा होने से ही बात बनती तो आज राम के वंशजों का समस्त पृथ्वी पर वर्चस्व होता...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

कितना अच्छा हो अगर हर परिवार में
डाक्टर हरिवंशराय "बच्चन " जी के जैसा वत्सल पिता और होनहार पितृ भक्त अमिताभ जैसा पुत्र जन्म ले ......
अभिषेक भी बहुत संस्कारी है ...
आगे की राम जाने ...
नई पीढी के संग नई बातें जुड़ जायेंगीं ......काश !
हिन्दी साहित्य के अन्य जगमगाते सितारों का नाम भी इसी तरह श्रध्धा व आदर के साथ लिया जाए तब हम सही अर्थ में , सुसंकृत कहलाने लगेंगें ....
मुझे याद करने के लिए आपका आभार
आभा बहूरानी जी :)
हमारे बोधी भाई साहब को बधाई ...
नई पुस्तक कब तक तैयार हो जायेगी ?
स स्नेह,
- लावण्या

Mired Mirage ने कहा…

आभा, यदि इतने 'बड़े कवि' शूद्र कह रहे हैं तो शायद कायस्थों को भी अब कुछ प्रतिशत आरक्षण की माँग शुरू कर ही देनी चाहिए। जो भी हो रोचक जानकारी है।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari ने कहा…

बच्चन परिवार को शुभकामनाएँ.

अच्छा लगा आपका आलेख (वैसे तो कायस्थ मैं भी हूँ :))

आभा ने कहा…

घुघूती जी
बच्चन जी की खुद को शूद्र कहने वाली बात में आरक्षण के लिए छटपटाहट की जगह यदि आप कवि समाज में उनको लेकर हो रहे भेद भाव को ध्यान में रखें तो शायद उनके कथन का मर्म अधिक समझ में आएगा.... ऐसे ही उपेक्षा के दंश से छटपटा कर कभी निराला जी ने खुद के लिए कहा था.....ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत।
समीर भाई....कवि के कथन को कवि हृदय से देखिए...

सारिका सक्सेना ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपका यह लेख। सुन्दर।

rashmi ravija ने कहा…

bahut hi achhi lagi prastuti...is parivar ne to kahir ek aadarsh bhartiya parivaar ki chhavi ko bakhoobi barkaraar rakha hai...bhartiya sanskriti aur sanskaaron ko akshunn banaye rakhne me ika koi saani nahi.

rashmi ravija ने कहा…

abha ji,aapka email id nahi mila...aap kya mumbai blogger meet me aa rahi hain? main bhi mumbai me hun...aapka plan jaanana chahti thi...mujhse...
rashmeeravija26@gmail par sampark karen..plss

ज्ञानदत्त G.D. Pandey ने कहा…

कायस्थ तो अपनी तहजीब के कारण ही समाज/सरकार में जगह बना सके थे। अब उन्हें वर्णाश्रम के खांचे में चाहे जहां फिट किया जाये!
मनुष्य का बड़प्पन/मेधा जीन्स और वातावरण - दोनो से प्रभावित होता है।
उदाहरण के लिये मैं केवल आधुनिकता के वशीभूत यह नहीं छिपाऊंगा कि मेरे पुरखे पुरोहिती करते थे या मेरे बाबा प्राइमरी स्कूल के मास्टर/हेडमास्टर थे।

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने, वाकई कोई बड़े कुल में जन्म लेने भर से बड़ा नहीं होता।

आभाजी - कृप्या आपका ईमेल पता मुझे कहीं भी नहीं मिला, कृप्या मुंबई ब्लॉगर्स मीट के लिये संपर्क करॆं, मेरा ईमेल पता है rastogi.v@gmail.com

रचना ने कहा…

बच्चन परिवार को मंच पर बैठे देख रही थी, सुन रही थी, सुनते हुए यह सोच रही थी, कि हरिवंश राय बच्चन खुद को कायस्थ (शूद्र?) कहते हैं ।यह तो उनकी बात है, पर सच तो यह लगता है कि वह ही नहीं उनका पूरा कुनबा अपनी करनी से कर्म श्रेष्ठ -कुल श्रेष्ठ है । कर्म ही जाति है

kayasth naa to shudr haen naa brahmin wo chitrgup kae vanshaj haen

bachchan ji ne jo kehaa usko agar ham word by word likhaegae to galat haen

us samay unkae kyaa circumstances they baat tab ki haen

aur agar aap ki yae post is baat par haen ki shudr ho kar bachchan parivaar kae karm unko badaa banaatey to aap kaa nazariya bahut hi sankeend haen

आभा ने कहा…

रचना जी
टिप्पणी के लिए आभार
आप शूद्र शब्द के आगे लगाया हुआ प्रश्न वाची चिह्न नहीं देख रही है। यह तो बच्चन जी का बड़प्पन है कि वे अपने को छोटा मान रहे हैं। जो बड़ा होता है वहीं ऐसा कर पाता है।
और बच्चन जी के मंतव्य को समझने के लिए उदार मन से सोचना होगा। संकीर्णता से सोचने पर आप किसी नतीजे पर नहीं पहुँचेगीं ।
यह तो कोई मूर्ख ही होगा जो इस बड़ी जाति को छोटी करके देखेने की हिमाकत करेगा।

रचना ने कहा…

agar aap ne kyaa bhulu kyaa yaad karu padhi haen to aap ko usmae raam ji sharn saxsena kae makaan kaa ullekh milaega jahaan bachchan ji kaa vivaah hua thaa
raam ji saran saxena ki naatin hun rishtey mae
easaa samay bhi hotaa haen jab insaan kae paesaa naa naam hota haen naa paesaa aur yae kyastho ki trasdi rahee haen ki wo highest point of achievement par ho kar bhi best nahin paatey
bachchan ji ne jo shudr kaa prayog kiyaa haen abha ji usko ignore karna hi betar thaa naa ki kyastha shudr hotey haen ki tarj par baat ko aagey laejaana

kyaastha vaeshy nahin hotey haen
abhaa ji aur agar aap ke aalekh mae "shudr " ki baat ko metav naa diyaa gayaa hotaa to mujeh lagtaa haen jyadaa behtar prastuti hotee

आभा ने कहा…

मैंने तो बच्चन जी को कोट किया है। किसी की बात को भला मैं सेंसर करने वाली कौन हूँ। रही बात कायस्थों के वैश्य होने की तो मेरी एक अध्यापिका नें पढ़ाया था कि कायस्थ वैश्य समुदाय के अन्तर्गत ही रखे जा सकते हैं।

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

aalekh ya kahu reportaaz achhi he. savaal aour usaka javaab saarthak he/
mujhe thoda saa khatakaa bas yah ki harivanshji KAYASTH the, is baare me kahte bhi rahe, kintu use SHUDR ke drashtikon se kadaapi nahi, kaaysth ka arth yaa is jaati vishesh ke baare me me thoda bahut jaantaa hu, kuch jyada jaankaari aapke paas ho to krapyaa bataaiye.

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

oh, tippaniya padhhne ke baad mujhe kaayasth par likha aour aapka us par gyaan ke baare me pataa chal gyaa he,,,me khud kaayasth hu aour usaka sarikaji ne kuchh varnan kiya he..iska shabdik arth aour vistrat etihasik arth dilchasp he.., kintu aapki jaankari ke liye bataa du ki yah jaati na to shudr he n hi veshy..., haa, kuchh jagah ise aarakshit karne ka mudda bhi uthaa..magar esa kuchh he nahi..
sankshipt me KAYASTH yaani KAYA ME STHIT, JO BRAMHM he VISHNU AOUR MAHESH HE../KAYA ME AATMA STHIT HE ..aatma..amar aour savarn he../ kher..
is bahaane kam se kam aapko KAYASTH ki jaankaari to prapt hui hi/

अभय तिवारी ने कहा…

बढ़िया बहस चल रही है..

वैसे मैं अमिताभ श्रीवास्तव की बात का अनुमोदन करता हूँ.. 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' में बच्चन जी स्वयं लिखते हैं कि कायस्थ का मतलब जो काया से उत्पन्न हुआ हो.. पुरुष सूक्त चार वर्णों की उत्पत्ति के स्थान बताता है- मुख, बाहु, जंघा और पैर.. कायस्थों के बारे में मत उनका ये है कि चूंकि वे सम्पूर्ण काया से उपजे तो कायस्थ कहलाए.. (वैसे शब्द संधान करें तो शब्द कायज होना चाहिये कायस्थ नहीं, लेकिन व्याख्या बच्चन जी की है मेरी नहीं).. इशारा ये है कि कायस्थ में चारों वर्णो के लोग समाहित हैं.. कोई मुख से आया, कोई भुजा से कोई पैरों से..

जब तक कोई विवाद न हो तो ब्लाग और पोस्ट हिट नहीं होता.. आप को बधाई हो आप की पोस्ट हिट है और ऐसे ही विवादास्पद लिखती रहिये तो ब्लाग भी हिट बना रहेगा..

रचना ने कहा…

अध्यापिका नें पढ़ाया था कि कायस्थ वैश्य समुदाय के अन्तर्गत ही रखे जा सकते हैं।

bhrantii
aur galat avdharna

आभा ने कहा…

मुझे लगता है कि बच्चन जी को भी ये तथ्य पता रहे होंगे। लेकिन उनके निजी मत के पीछे कोई तो आधार रहा होगा। आखिर क्यों कर उन्होंने अपने को कायस्थ(शूद्र?)कहा।
मैं खुद कायस्थों को अगड़ी और उच्च जाति वर्ण की मानती हूँ। लेकिन यह बात स्वर्गीय बच्चन जी को कैसे समझाएँ। उनके कहे में संशोधन कैसे करें।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने, वाकई कोई बड़े कुल में जन्म लेने भर से बड़ा नहीं होता।
बहस अच्छी चल रही है। मुझे लगता है जतो धर्म पर बहस कभी न खत्म होने वाला सिलसिला है। क्या इतना कफी नहीं कि हम सब इन्सान हैं ? बच्च्नन परिवार को शुभकामनायें

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... सच कहा !!!!

PD ने कहा…

वाह मजेदार बहस चल रही है.. मेरे साथ भी कायस्थ और शूद्र को लेकर एक मजेदार घटना घटी थी.. उस समय मैं 14-15 साल का रहा होऊंगा.. कहानी थोड़ी लम्बी है, सो इस पर एक पोस्ट तो बनती है.. उसका लिंक मैं यहां भी देता जाऊंगा.. :)

आभा ने कहा…

रचना दी और मित्रों
मैंने अपनी इस पोस्ट में किसी को आहत करने की नहीं सोची थी...लेकिन बात न जाने कहाँ चली गई।
मेरी अध्यापिका द्दारा यह बताया जाना कि कायस्थ वैश्य वर्ण में आते हैं भ्रान्ति पूर्ण नहीं बल्कि सही है । इस बात को प्रमाण रूप में जानने के लिए -भारत वर्ष में जाति भेद नामक किताब का पेज नं.163 देख लें । इसके लेखक आचार्य क्षितिमोहन सेन शास्त्री हैं। इस किताब का संपादन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने किया है।
जब मुझे पहली बार यह जानकारी मिली कि कायस्थ वैश्य के अंर्तगत आते हैं तब मै दस वर्ष की थी । पर आज मेरी गुरु की दी हुई दीक्षा को दो आचार्यों के लेखन संपादन का समर्थन मिल गया है।
मैं किसी जाति के घन चक्कर में नहीं रहती। मैं तो जाति न पूछो साधु की में यकीन रखती हूँ। लेकिन बात सबूत और साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है तो मैंने केवल सूचना देने भर के लिए लिख दिया फिर से ।
किताब के प्रकाशक हैं-साहित्य भवन प्रां. लिं. इलाहाबाद और संस्करण है 2006 का।