सोमवार, 9 जुलाई 2007

आभा की दूसरी कविता

बन्धन

हेनरी फ़ोर्ट ने कहा-
बन्धन मनुष्यता का कलंक है,
दादी ने कहा-
जो सह गया समझो लह गया,
बुआ ने किस्से सुनाएँ
मर्यादा पुरुषोत्तम राम और सीता के,
तो मां ने
नइहर और सासुर के गहनों से फ़ीस भरी
कभी दो दो रुपये तो
कभी पचास- पचास भी।
मैने बन्धन के बारे मे बहुत सोचा
फिर-फिर सोचा
मै जल्दी जल्दी एक नोट लिखती हूँ,
बेटा नीद मे बोलता है,
मां मुझे प्यास लगी है।

2 टिप्‍पणियां:

अभय तिवारी ने कहा…

अच्छा है आभा जी.. चिट्ठे की दुनिया में स्वागत है आप का.. अब लगातार लिखिये.. और कुछ लोगों की ख्याति को अपनी ख्याति की चमक से धूमिल कीजिये..

अपना घर ने कहा…

आपने पढ़ा अच्छा लगा,
धन्यवाद