मंगलवार, 18 सितंबर 2007

रामलीला और सीतवा

देवताओं के साथ लीला

हम जब छोटे थे तब मोहल्ले के बच्चों के साथ एक झुंड बनाकर रामलीला देखने जाते थे। हम लोगों को घर के लोग रामलीला देखने जाने से रोकते थे और रोकने का करण पूछने पर बताया जाता था कि इस तरह की रामलीला में रामायण और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है। फिर भी हम बच्चे किसी ना किसी तरह से रामलीला देखने चले ही जाते थे। कभी घर के लोंगों को पटा कर कभी चोरी छिपे।

वहाँ पहुँच कर लगता कि साक्षात राम सहित सभी देवताओं के दर्शन हो गये। देवताओं को देखने के बाद लगता कि घर वाले ही मूरख थे जो आने नहीं दे रहे थे।

ठीकठाक चल रही रामलीला में कुछ ऐसा होता जिससे सभी दर्शक खूब हँसते। हुआ कुछ ऐसा । लखन को शक्ति वाण लगने पर सीता के रोने का प्रसंग था। सीता रो रहीं थी । दर्शकों का हँसना सीता के रोने पर था । सीता यह कह कर रो रहीं थी कि –

अब हमके फटफटिया पर के घुमाई।
अब हमके जलेबिया के खिआई ।
अब हमके सिनेमा के देखाई
अब हमरे मेला के देखाई।

सीता का यह रोना दर्शकों को रुलाने की जगह हँसा गया था। हँसने में हम भी भूल गये थे कि यह कैसी सीता और कैसा उसका दुख।

बाद में सीता हरण भी हुआ। अगले दिन हम फिर रामलीला मैदान पहुँचे। हम सब तन्मय होकर रामलीला देख रहे थे तभी किसी दर्शक ने कल की लीला में सीता की भूमिका करने वाले लड़के को पहचान लिया। आज उसकी भूमिका नहीं थी और वह खुद रामलीला देखने आया था। अपने पास सीता को पैंट-शर्ट में पाकर हम हैरान थे। कल जिस के हरण और विलाप पर हम रो और हँस रहे थे वह आज हमारे बीच बैठा दूसरे पात्रों पर हँस रहा था । किसी एक ने जोर से पुकारा अरे सितवा आया है ....सितवा । कुछ दर्शक सीता को देखने लपके लेकिन तब तक खेल खतम हो गया दर्शक उठने लगे और सितवा भीड़ में खो गया ।

देवी देवताओं को लेकर घरवालों का नजरिया तब हमें बुरा लगा था लेकिन बाद में हम समझ गये कि घरवाले ठीक थे। आज भी देश में कुछ लोग ऐसा ही कर रहे हैं। उनके लिए सीता राम मजाक के पात्र हैं । खेल का विषय। और हम सब दर्शक । कोई इस खेल को रोकने वाला नहीं है।

7 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

मस्त!!
शुक्रिया इस संस्मरण को बांटने के लिए!
हम खुद कभी इस तरह की रामलीलाना कभी देख पाए ना ही इससे जुड़े किस्सों के पात्र बन पाए, इसलिए अच्छा लगता हैं ऐसे संस्मरण पढ़ना।
कभी-कभी ऐसा भी लगने लगता है कि गांव-घर के ऐसे माहौल में बचपन क्यों नही बीता हमारा भी!!

आशीष ने कहा…

bahut majedar kissa sunaya hain apne...
maza aa gaya

काकेश ने कहा…

मजेदार रही ये रामलीला!!

Udan Tashtari ने कहा…

इतना जीवंत चित्रण अपने संस्मरण का, बिल्कुल बचपन में लौटा ले गईं आप और उसे आज की घटना से बहुत सहजता के साथ पिरोने के लिये बधाई. सच में, आज कोई नहीं दिख रहा इस मजाक को रोकने वाला.

हरे प्रकाश उपाध्याय ने कहा…

bahut prasangik aur rochak.aapka gdya bahut achchha hai. nirantar jari rahen.badhai.

आभा ने कहा…

संजीत जी ऐसी भाषा और राम लीला तो मैंने इलाहाबाद में देखी है। आपके शहर में भी होती होगी।
आशीष जी अभी हजारों किस्से है ऐसे।
काकेश जी पढ़ने के लिए शुक्रिया।
समीर जी तारीफ के लिए शुक्रिया।
हरे प्रकाश जी
लिख पाना बहुत ही मुश्किल होता है पर मैं लिख रही हूँ।

राज यादव ने कहा…

आभा जी ,सित्वा के बारे मे सुना के आपने ,घर और बचपन कि याद दिला दी ,कितने अनूठे ढंग से आपने प्रस्तुत किया ..बहुत अच्छा ....शायद आप भी यू.पी के ही हो ...हमारे यहां ऐसे ही बोलते है ...सित्वा ,राम्वा ....अरे ! कल तो रव्न्वा ने बहुत अच्छा पाठ किया था ,ऐसा गरजा कि सित्वा डर गयी ...अच्छा लिखा है ...