गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

साथी की तारीफ करें

सुख-दुख

अक्सर ऐसा होता है जब हम बहुत खुश होते हैं और फिर अचानक हम दुखी भी हो जाते हैं....दुख सुख के बीच अजीब घालमेल हो जाता है.... गडमड्ड हो जाता है.....ऐसा ही कल भी हुआ...सुबह मेरे बोधिसत्व अपने काम से कम्प्यूटर पर थे और मैं घर के काम निपटा कर कुछ पढ़ रही थी...तभी बोधि उठ कर आए और मेरी तारीफ करने लगे....वो कहने लगे आभा तुम बहुत कुछ जानती हो बस बच्चों को बड़ा होने दो हम तुम मिल कर काम करेंगे....बहुत कुछ करना है....मैं तुम्हारे साथ हूँ...थोड़ा इंतजार और करो.....वह दिन भी आएगा जब तुम अपने मन का काम कर पाओगी...।

मैं बहुत खुश हुई .....ऐसा लगा जैसे मैंने जो चाहा था पा लिया.... बोधि चले गए और मैं खुशी के मारे रोने लगी.....मैं और जोश में आकर किताब के बाकी के 80 पेज भी पढ़ गई....दिन बहुत अच्छा बीता....पति की एक तारीफ ने मुझे नई ऊर्जा से भर दिया....।
लेकिन देर रात गए जब ब्लॉग पर बैठी तो नीलिमा और सुजाता के पोस्ट ने मन को फिर उदास कर दिया...कि यह क्या है....।

मैंने माना यही है जीवन यही है जीवन की सच्चाई...यही है सुख दुख का संघर्ष...जिसमें एक कैसी भी तारीफ एक उत्साह का शब्द भी आपको मैदान में लड़ने के लिए शक्ति दे सकता है और एक दुत्कार भरा संबोधन आपको हताशा और कुंठा से भर सकता है...।

मैं सभी ब्लॉगरों से यही कहना चाहूँगीं कि यह नारी-नर वाद और बटन न टाँकने जैसी सस्ती बातें छोड़ कर एक दूसरे का सहयोग करें॥अपनी शक्ति को और हुनर को तो पहचाने ही साथ वाले के गुणों को भी तरजीह दें... उसे बढ़ावा दें न कि सपना की डायरी के पन्नों को हताशा से भरें.......बल्कि उसे डायरी के पन्नों में सुख के लिए भी जगह छोड़ें।

14 टिप्‍पणियां:

सुजाता ने कहा…

आभा जी ,
आपका और बोधिसत्व जी का यह साथ और् सहयोग बना रहे । यह तो बहुत अच्छी बात है ।इसके लिए बोधिसत्व जी की भी प्रशंसा करनी होगी ।
लेकिन लगता है कि मेरी उस पोस्ट को बहुत से लोगों ने थोडा गलत दिशा मे ले लिया।
आपने लिखा है -
"बटन न टाँकने जैसी सस्ती बातें छोड़ कर एक दूसरे का सहयोग "

और वहीं ,उस पोस्ट के नीचे अनूप भार्गव जी का कमेंट है कि -"...समस्या निश्चित रूप से सिर्फ बटन न टाँकना नही हो सकती ....."
शायद वे ही समझे थे कि इशारा किस ओर है ।

बटन टाँकना कोई सस्ती बात न होकर एक खास प्रकार के रोल और अपेक्षित व्यवहारों का प्रतीक भर है । जिसे तोड़ने की क्षमता हर स्त्री धीरे धीरे जुटाती है ।
मुझे व्याख्या करनी पड़ी , इसके लिए मैं अपनी अस्पष्ट लेखनी को ही कसूरवार ठहराती हूँ । क्षमा करें ।

आभा ने कहा…

मैं भी मानती हूँ कि हर किसी का एक रोल होता है...समाज में घर में...परिवार में..हाँ.बटन टाँकने भी एक गुण है...जिसको मैं कह रही हूँ कि अपनी क्षमता को पहचाने.....हाँ यह जरूर है कि क्या शहर क्या गाँव गुण और शक्ति को भी घुट कर मरना पड जाता है...
और एक बात यह भी है कि बिना सामन्जस्य के तो नहीं चलेगा यह जीवन....सामन्जस्य को समझौता भी कह सकती हैं...
रहीम का दोहा है
रहिमन देख बड़ेन को लघु न दिजिए डारि
जहाँ काम आवै सुई उहा कहाँ तलवारि । इसे भी याद रखें ।

Aflatoon ने कहा…

'मेरे बोधिसत्व', हमारे भी हैं !

आभा ने कहा…

अफलातून भाई सो तो है ही...मैं तो भूल ही गई थी यह बात...

PD ने कहा…

वैसे आभा जी, एक बात कहना चाहूंगा कि मेरे घर में मुझसे अच्छा बटन और कोई नहीं टांकता है.. शायद शादी के बाद भी ये भूमिका निभानी परेगी.. शायद क्या सच में.. :D और मुझे कोई गिला ना होगा..

काकेश ने कहा…

हर कोई बुद्ध नहीं होता और हर कोई बोधिसत्व भी नहीं. बांकी 'मेरे' पर थोड़ा हक 'हमारा' भी बनता है इस बात को मानने के लिये आभार.

Sanjeet Tripathi ने कहा…

:)

क्या कहूं, ऐसे गंभीर गंभीर मुद्दे देखकर मै तो खिसक लेना ही पसंद करता हूं लेकिन यहां से खिसक भी नई सकता न आसानी से!

अभय तिवारी ने कहा…

प्रेम बड़ी चीज़ है.. क्षमा उस से भी बड़ी.. प्रेम में व्यक्ति कितने अपराधों को क्षमा कर देता है.. प्रेम दोनों तरफ़ से ऐसा हो तो क्या कहना.. बना रहे.. आमीन!

Divine India ने कहा…

बिल्कुल सत्य विचार… किंतु बात रखना भी आवश्यक है…।

मीनाक्षी ने कहा…

प्रेम और क्षमा दोनों में हों तो जीवन का रूप ही बदल जाए बशर्ते कि
कमज़ोरी का रूप न ले.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब! बहुत अच्छा लिखा। पढ़कर मन खुश हो गया। आपकी तारीफ़ करता हूं कि इतनी सहजता से अपनी बात कही।

DR.ANURAG ARYA ने कहा…

मेरा ऐसा मानना है की अब हालत बेहतर हो रहे है ओर पुरूष स्त्री के सभी कामो मे हाथ बटाने लगे है ,मैं ओर मेरे दोस्त जिनकी कामकाजी पत्निया है आज भी अपने बेटे को नहलाते दुलाते खाना खिलते है ,अपने अपने profeesion मे जिसको जैसा समय मिलता है वो उसी तरह से समय दे देता है....शायद आज की पीढ़ी की यही सोच है....

pallavi trivedi ने कहा…

मैं मानती हूँ कि छोटी छोटी तारीफें ,प्रेम के शब्द इंसान को नया जोश नयी ऊर्जा प्रदान करते हैं!बहुत सही कहा आपने...

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

बहुत अच्छी बात कही आपने. साथी की तारीफ़ करना एक अच्छी बात है. इस से जीवन में मधुरता आती है. सच पूछिये तो किसी की भी तारीफ़ करने से चूकना नहीं चाहिए. दूसरों की तारीफ़ आप को सब का प्रिय बनाती है. पर किसी तंग निजी स्वार्थ को ले कर की गई तारीफ़ अंततः नुकसान ही पंहुचाती है.