रविवार, 2 अगस्त 2009

स्वतंत्रता पुकारती है, पर इससे बचाओ रे राम



अस्तित्व की स्वतन्त्रता किसे अच्छी नहीं लगती, हर कोई चाहता है कि उसे आजाद छोड़ दिया जाए, उड़ान भरने के लिए । पर ऐसी आजाद उड़ान क्या सही दिशा में पहुँच कर मुकाम तय करेगी, इसकी किसे खबर। यह बात मैं उनके लिए नहीं कर रही जो 18 की उम्र को पार कर चुके हैं बल्कि मै टीन एजर्स की बात कर रही हूँ, जिन्हें सही क्या है और गलत क्या है कुछ पता नहीं होता। इस उम्र में ज्यादा तर बच्चे आजादी चाहते हैं, वे चाहते हैं कि वो जो इच्छा जाहिर करे उसे घर वाले तत्काल पूरा करें, सवाल है क्या हर इच्छा पूर्ति सही है, क्या मां-बाप प्यार में अंधे हो कर अपने ही बच्चे या बच्ची के अस्तित्व को अधर में नहीं लटका देते। जहाँ वह न तो शान से जी सकता है और उसकी मुश्किल है कि मुँह चुरा कर जीना नहीं चाहता है या चाहती हैं ।


अपने ही घर की बात करूँ तो मेरा बेटा मानस जो कि 8वीं में पढ़ता है और घर आने जाने वाले, नातेदार सभी उसकी तारीफ करते कहते हैं कि मानस बहुत सहज सरल है, या मानस बड़ा अच्छा लड़का है, उसकी तारीफ सुन कर खुश होने के साथ ही मैं मन ही मन डर कर कह पड़ती हूँ, हे प्रभो इस जीवन में कुछ देना या न देना दो अच्छे बच्चों की मां जरूर बने रहने देना, पता नहीं भगवान मेरी सुन रहे हैं कि नहीं यह तो समय ही बताएगा, करनी भरनी तो देखना ही होगा।


बनने बिगड़ने के सवाल का जवाब ढूढते हुए मैने आठवीं में पढ़ रहे अपने बेटे मानस से एक दिन पूछा कि जब तुम्हारी कोई माँग तत्काल पूरी नहीं की जाती तो तुम क्या सोचते हो, मानस ने कहा मेरा तो काम है माँग करना, सही या गलत समझना तुम्हारा फर्ज है, तुम मां हो ।

मैंने मानस से समझ लिया मां के फर्ज को ....प्यार दुलार के साथ अनुशासन ही सही दिशा है. ।अक्सर इस बात का भय सताता है कि जो सहज होता है वही जल्दी भटकता भी है.....। अगर बात करूँ पारिवारिक माहौल की तो यह भी तय है कि कोई भी घर- परिवार झगड़े और वैचारिक भेद से परे नहीं है । इस परिस्थित में यदि हम पति- पत्नि के बीच बहस होती है, वह चाहे पारिवारिक हो या कोई सामाजिक, राजनितीक मुद्दा, उस वक्त हम या कोई भी सिर्फ अपनी बात साबित करने पर तुले होते हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि इस बहस का नतीजा हमारे बच्चों को क्या क्या सोचने को मजबूर करेगा । ऐसी ही बहस की स्थित में एक दिन मैनें बेटे मानस से पूछा बेटा, तुम मेरे और पापा के बारे क्या सोचते हो सिर्फ एक एक वाक्य लिख कर दो। बेटे ने लिखा मेरे पापा बहुत मजाकिया और थोड़े गुसैल आदमी है । मेरी माँ नेक ख्याल रखने वाली पारखी महिला है, हम दोनों के बारे में मानस की यह राय सुकून देती रही। साथ ही मानस से जब यह पूछा कि अगर तुमसे कहा जाए कि तुम अपने फैसले खुद लो तो उसने उत्तर दिया, फैसला लेना तो आता ही है पर उस फैसले से मुझे सही मुकाम मिलेगा या नहीं यह पता नहीं, ऐसे फैसले तो जिन्दगी को जुए की तरह खेलने जैसा होगा जहाँ हमें जीत भी मिल सकती है बरबादी भी।
मेरे कहने का मतलब सिर्फ यह है कि क्या 18 साल से कम उम्र के बच्चों को पूरी स्वतन्त्रता दे दी जाए? क्या हर बच्चा परिस्थित के हिसाब से सही को सही और गलत को गलत समझ सकता है ?

लगातार.......

12 टिप्‍पणियां:

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने । भाव और विचारों की सुंदर प्रस्तुति के साथ ही कुछ सामायिक प्रश्नों को भी आपने प्रमुखता से उठाया है। सटीक शब्दों केचयन और विचारशीलता के समन्वय से लेखन प्रभावशाली हो गया है।
मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-इन देशभक्त महिलाओं केजज्बे को सलाम-समय हो तो पढें़ और कमेंट भी दें।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

M VERMA ने कहा…

"अस्तित्व की स्वतन्त्रता किसे अच्छी नहीं लगती"
सही है
अच्छा आलेख

श्यामल सुमन ने कहा…

अपने अनुभवों के आधार पर एक उपयोगी चर्चा पसन्द आया।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Aflatoon ने कहा…

'नेक ख़याल रखने वाली पारखी महिला’ को प्रणाम ।

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन..बहुत कुछ सोच ले जाने को प्रेरित करता आलेख..बहुत दिनों बाद!!

ravishndtv ने कहा…

स्वागत है आपका। आपके लिखे का इंतज़ार रहेगा।
मानस का जवाब हमारी ज़िम्मेदारियों की तरफ इशारा करता है।

Vivek Rastogi ने कहा…

गलत समझना बच्चे की समझदारी पर निर्भर है जैसे मैं अपने बेटे को बोलता हूँ कि आपने ये काम आपको नहीं करना चाहिये था परंतु फ़िर भी किया और उसे भी पता रहता है कि वह गलत कार्य कर रहा है परंतु फ़िर भी उसकी चंचलता उसे वह कार्य करने को उत्साहित करती है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

बच्चों को कैसे पाला - वह तो बहुत ठीक से याद नहीं; पर उत्कृष्ट सहकर्मियों को कैसे नर्चर करते हैं - यह मालुम है। पूरी आजादी और गतिविधियों पर कसा हुआ निग्रह - यही मूलमन्त्र है।
और यह अठ्ठारह की उम्र से सम्बन्ध नहीं रखता। उसके पहले और उसके बाद भी चलता है।

PD ने कहा…

अरे, मानस के बारे में तो आपने बता दिया मगर भानी कहां है? बहुत दिन हो गये उसकी तस्वीर देखे.. अब तो बड़ी हो गई होगी.. :)

Mired Mirage ने कहा…

आभा, बहुत ही सही लिखा है। बच्चों को बड़ा करना अपने आप में सबसे ही बड़े दायित्व का काम है। महानगरों में तो और भी अधिक कठिन काम है। मुझे लगता है कि जहाँ तक हो सके उन्हें मार्ग दर्शन देते हुए उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने देने चाहिए। बस उन्हें यह बताते रहना चाहिए कि उनके किसी निर्णय का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
मानस इतना सुलझा हुआ है देखकर बहुत खुशी हुई। उसने जो आपके बारे में कहा उससे बड़ी प्रशंसा और क्या हो सकती है?
घुघूती बासूती

आभा ने कहा…

ङाअशोक जी आप के ब्लांग तक पहुँचने का अथक प्रयास विफल रहा ,कल फिर कोशिश करती हूँ , सादर आभार,

अनूप शुक्ल ने कहा…

नेक ख्याल वाली पारखी महिला की जय हो। मजाकिया स्वभाव वाले के लिये पानी की सप्लाई बढ़ा दी जाये, गुस्सा कम आयेगा।