वह पलम्बर कौन था जो हम सब के लिए भगवान बन कर आया था। आया तो था वह घर का नल ठीक करने के लिए पर मेरी माँ को जीवन दान दे गया। वह मेरी बीमार माँ को आग में झुलसने से बचा गया। उसका आना महज एक संयोग था या और कुछ।
माँ भाई और भाभी के साथ नोयडा में रहती हैं। भैया भाभी दोनों सुबह ही ऑफिस निकल गये थे। उनकी दोनों बेटियाँ भी पढ़ने स्कूल चली गईँ थीं। घर में काम करनेवाली लड़की किरन ही थी उस समय माँ के साथ, लेकिन वह काम में लगी थी । माँ बीमारी के बाद भी बिना पूजा किए नहीं रहतीं। कल वह पूजा करने जा रही थी कि तभी वह प्लम्बर आया । नल ठीक करने। किरन दरवाजा खोल कर काम में लग गई। माँ हर दिन की तरह पूजा कर रही थी कि उसकी साड़ी का पल्लू दीये की लौ से लिपट गया और उसमें आग लग गई। पर माँ को खुद कुछ पता नहीं था और वह आरती और पूजा में मगन थी। उस प्लम्बर ने माँ के पल्लू को जलते देखा और लपक कर उसने आग बुझाई। माँ एक बड़े हादशे का शिकार होने से बच गई। माँ इस समय पैंसठ छाछठ साल के आस-पास की है और उसका बायाँ पक्ष लकवे का शिकार है इस कारण उसमें वह पुरानी तेजी नहीं रह गई है। अगर वो जल जाती तो बहुत बुरा होता उसके साथ। और हम उसकी छाया से वंचित हो जाते। उम्र और बीमारी आदमी को कैसे बदल देते हैं जबकि मेरी माँ बड़ी समझदार पढ़ाकू और ज्ञानी महिला है। वो कौन है माँ के अलावा उसके गुन फिर कभी गाऊँगी।
फिलहाल तो यही सोच कर मन को शांति है कि मेरे भैया एक बड़ी मानसिक सामाजिक और कानूनी तकलीफ में पड़ने से बच गए। जब कि वो माँ का अपने बच्चो से बढ़ कर ध्यान रखते हैं साथ ही मेरी भाभी भी । आज मेरे दोनों पिता नहीं है यानी मेरे बच्चों के नाना और दादा। मेरी दोनों माएँ स्वस्थ रहे और उनका आशीष बना रहे यही इच्छा है।
मैं माँ से बहुत दूर हूँ । हालाकि सुबह उससे बात हो गई है और वह ठीक है। पर सोच रही हूँ कि अगर वह प्लम्बर न आया होता तो पता नहीं क्या होता। आज तो उस प्लम्बर का ही गुन गाने का मन है जिसने मेरी माँ को जलने से बचाया। भगवान उसका भला करें। जिसका नाम तक हमें नहीं पता ।
शनिवार, 3 नवंबर 2007
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007
जैसे स्वर्ग की अप्सरा थी अब घरेलू मक्खी हूँ
आते ही माफी माँग लूँगी
आजकल मेरा बेटा मानस का मन पढ़ाई में बिल्कुल ही नहीं लग रहा है। दूसरी ओर मैं लगातार दो महीने से अपनी तबीयत खराब होने से दवाओं में उलझी हूँ। कल रात मैंने मानस को न पढ़ने के लिए कुछ ज्यादा ही डाँट दिया। अपनी डाँट से मैंने मानस को ठीक से एहसास दिला दिया कि मैंने उसके ही कहने पर अपनी नौकरी छोड़ी है। जब मैं पढ़ा रही थी तब उसका कहना था कि बेबी सिटिंग में उसका मन नहीं लगता है।
उसी दौरान उसका एक छोटा सा ऑपरेशन भी हुआ जिसके चलते वह करीब 20 दिन स्कूल से बाहर अस्पताल और घर पर रहा। उसके साथ साथ छुट्टी लेकर मैं भी लगातार घर पर बनी रही। लेकिन ठीक होने के बाद वह स्कूल जाने को तो राजी था पर बेबी सिटिंग जिसे महाराष्ट्र में पालणा घर कहते हैं में दिन गुजारने को तैयार नहीं था। विरोध के लिए या जिस भी कारण से उसने टिफिन खाना छोड़ दिया। पूरा टिफिन घर लाता और बेबी सिटिंग में भी कुछ नहीं खाता था। उसके इस व्यवहार से हम सब लगातार परेशान रहने लगे। ऐसा करीब दो महीने चला । मैं इस उम्मीद में थी कि बेटा समझ जाएगा और सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ । बल्कि कुछ दूसरा ही हुआ। जो कि एक दम उम्मीद के खिलाफ था। उसके पापा दिल्ली गए थे और रात में दस बजे मैं उसे सुला कर सो गई । रात में उसके रोने की आवाज सुन कर मैं जाग गई। करीब एक बजे थे और वह सोने की जगह चादर में मुँह ढँक कर रो रहा था । मैंने रोने की वजह पूछी तो बोला कि तुम कल से पढ़ाने मत जाओ। मैं अकेले घर में रहूँगा लेकिन बेबी सिटिंग में नहीं जाऊँगा। बात चीत के बीच मानस ने कहा कि उसे एक भाई या बहन भी चाहिए।
उसकी बातें सुन कर मैं परेशान हो गई और उससे कहा कि वह सो जाए। मैं पढ़ाने नहीं जाऊँगी। अगले दिन मैंने विद्यालय को इस्तीफा लिख कर काम से छुट्टी पाली। दिल्ली से लौटने पर मानस के पापा से मानस की बातें बताईं। पहले तो वे काफी भड़के फिर मेरे फैसले को सही बताया। उसके बाद मेरी बेटी भानी पैदा हुई। मानस और भानी दोनों की उम्र में काफी फर्क है लगभग 8 साल का। लेकिन तब से मानस खुश है और दोनो हिल मिल कर रहते हैं।
लेकिन कल उसे डाँट कर मैं इस उलझन में पड़ गई हूँ कि मैंने उससे अपनी नौकरी छूटने का कोई बदला तो नहीं चुकाया। मैंने उसे यह तक जता दिया कि जैसे मैं नौकरी करते समय मैं स्वर्ग में अप्सरा थी और अब घरेलू मक्खी हो गई हूँ।
हालाकि अभी वह नार्मल है और स्कूल गया है पर मैं सोच रही हूँ कि उसके आते ही उससे माफी माँग लूँगी ।
आजकल मेरा बेटा मानस का मन पढ़ाई में बिल्कुल ही नहीं लग रहा है। दूसरी ओर मैं लगातार दो महीने से अपनी तबीयत खराब होने से दवाओं में उलझी हूँ। कल रात मैंने मानस को न पढ़ने के लिए कुछ ज्यादा ही डाँट दिया। अपनी डाँट से मैंने मानस को ठीक से एहसास दिला दिया कि मैंने उसके ही कहने पर अपनी नौकरी छोड़ी है। जब मैं पढ़ा रही थी तब उसका कहना था कि बेबी सिटिंग में उसका मन नहीं लगता है।
उसी दौरान उसका एक छोटा सा ऑपरेशन भी हुआ जिसके चलते वह करीब 20 दिन स्कूल से बाहर अस्पताल और घर पर रहा। उसके साथ साथ छुट्टी लेकर मैं भी लगातार घर पर बनी रही। लेकिन ठीक होने के बाद वह स्कूल जाने को तो राजी था पर बेबी सिटिंग जिसे महाराष्ट्र में पालणा घर कहते हैं में दिन गुजारने को तैयार नहीं था। विरोध के लिए या जिस भी कारण से उसने टिफिन खाना छोड़ दिया। पूरा टिफिन घर लाता और बेबी सिटिंग में भी कुछ नहीं खाता था। उसके इस व्यवहार से हम सब लगातार परेशान रहने लगे। ऐसा करीब दो महीने चला । मैं इस उम्मीद में थी कि बेटा समझ जाएगा और सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ । बल्कि कुछ दूसरा ही हुआ। जो कि एक दम उम्मीद के खिलाफ था। उसके पापा दिल्ली गए थे और रात में दस बजे मैं उसे सुला कर सो गई । रात में उसके रोने की आवाज सुन कर मैं जाग गई। करीब एक बजे थे और वह सोने की जगह चादर में मुँह ढँक कर रो रहा था । मैंने रोने की वजह पूछी तो बोला कि तुम कल से पढ़ाने मत जाओ। मैं अकेले घर में रहूँगा लेकिन बेबी सिटिंग में नहीं जाऊँगा। बात चीत के बीच मानस ने कहा कि उसे एक भाई या बहन भी चाहिए।
उसकी बातें सुन कर मैं परेशान हो गई और उससे कहा कि वह सो जाए। मैं पढ़ाने नहीं जाऊँगी। अगले दिन मैंने विद्यालय को इस्तीफा लिख कर काम से छुट्टी पाली। दिल्ली से लौटने पर मानस के पापा से मानस की बातें बताईं। पहले तो वे काफी भड़के फिर मेरे फैसले को सही बताया। उसके बाद मेरी बेटी भानी पैदा हुई। मानस और भानी दोनों की उम्र में काफी फर्क है लगभग 8 साल का। लेकिन तब से मानस खुश है और दोनो हिल मिल कर रहते हैं।
लेकिन कल उसे डाँट कर मैं इस उलझन में पड़ गई हूँ कि मैंने उससे अपनी नौकरी छूटने का कोई बदला तो नहीं चुकाया। मैंने उसे यह तक जता दिया कि जैसे मैं नौकरी करते समय मैं स्वर्ग में अप्सरा थी और अब घरेलू मक्खी हो गई हूँ।
हालाकि अभी वह नार्मल है और स्कूल गया है पर मैं सोच रही हूँ कि उसके आते ही उससे माफी माँग लूँगी ।
रविवार, 14 अक्टूबर 2007
जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान
संतोष से सुख
गीता में वे आदर्श जीवन मूल्य हैं जिन्हें जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए। पर वास्तविक समस्या तो मन की है। किसी चीज को देख कर मन में उसे पाने की एक स्वाभाविक इच्छा जाग जाती है। इससे लोभ उत्पन्न होता है। फिर मन संयमित नहीं है तो वह ईर्ष्या द्वेष में जकडता चला जाता है। उसी लोभ की चिंता में डूबने-उतराने लगता है। केवल धन मिल जाने से कोई सुखी नहीं हो सकता । क्योंकि इच्छाओं का अंत नहीं है। एक को पाकर दूसरी को पा लेने की इच्छा यह मनुष्य का स्वभाव है।
इसी लिए संतोष की महिमा गाई गई है। संत कबीर कहते हैं-
जिनके कछु ना चाहिए सोई सहंसाह
कबीर की निगाह में राजा वही है जिसे कोई कामना न हो। इच्छा के मिट जाने से मनुष्य सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त हो कर बेपरवाह हो जाता है। और चिंचित राजा हर हाल में राज्य विनाश ही करेगा। अपना घर भरने के लोभ में वह राज्य को निजी सम्पति बनाने के हर संभव उपाय करेगा।
राजा ही नहीं किसी को भी संतोष धन पाने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि संतोष ही असल धन है। क्या करूँ मेरा भी उपदेश देने का मन हो सकता है। सो दे दिया।
गीता में वे आदर्श जीवन मूल्य हैं जिन्हें जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए। पर वास्तविक समस्या तो मन की है। किसी चीज को देख कर मन में उसे पाने की एक स्वाभाविक इच्छा जाग जाती है। इससे लोभ उत्पन्न होता है। फिर मन संयमित नहीं है तो वह ईर्ष्या द्वेष में जकडता चला जाता है। उसी लोभ की चिंता में डूबने-उतराने लगता है। केवल धन मिल जाने से कोई सुखी नहीं हो सकता । क्योंकि इच्छाओं का अंत नहीं है। एक को पाकर दूसरी को पा लेने की इच्छा यह मनुष्य का स्वभाव है।
इसी लिए संतोष की महिमा गाई गई है। संत कबीर कहते हैं-
जिनके कछु ना चाहिए सोई सहंसाह
कबीर की निगाह में राजा वही है जिसे कोई कामना न हो। इच्छा के मिट जाने से मनुष्य सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त हो कर बेपरवाह हो जाता है। और चिंचित राजा हर हाल में राज्य विनाश ही करेगा। अपना घर भरने के लोभ में वह राज्य को निजी सम्पति बनाने के हर संभव उपाय करेगा।
राजा ही नहीं किसी को भी संतोष धन पाने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि संतोष ही असल धन है। क्या करूँ मेरा भी उपदेश देने का मन हो सकता है। सो दे दिया।
शनिवार, 6 अक्टूबर 2007
मेरा तेरा नाता
एक कई साल पुरानी कविता छाप रही हूँ........पता नहीं इसके भाव अभी पुराने पड़े हैं या नहीं। आप सब पढ़े और बताएँ....
संबंध
चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती ...
हमें सात फेरों या कि कुबूल है से
क्या लेना-देना
हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया बाती के
संबंध को......... मसलन रोशनी
हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा खत हमारी चमक में ।
तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना....कुछ पल।
संबंध
चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती ...
हमें सात फेरों या कि कुबूल है से
क्या लेना-देना
हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया बाती के
संबंध को......... मसलन रोशनी
हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा खत हमारी चमक में ।
तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना....कुछ पल।
रविवार, 23 सितंबर 2007
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ
डॉटर्स डे पर चक दे बेटियाँ
डॉटर्स डे मना रही हूँ, पर एक सवाल मन में बार-बार उठ रहा है कि चक दे इंडिया में कोच कोई महिला क्यों नहीं। कोई भी कह सकता है कि फिल्म चलती नहीं। खैर ।
बात इतनी सी है कि डॉटर्स डे उन बेटियों तक कोई रोशनी नहीं ले जा रहा है जिन्हें वाकई इस की जरूरत है। डॉटर्स डे या सन डे मनाने भर से बात नहीं बनने वाली। सिर्फ बेटा-बेटी एक समान कह देने भर से मामला दुरुस्त नहीं होती। आज भी लोग बेटी पैदा करने से बच रहे हैं। डॉक्टर आराम से कोख में बेटियों को कत्ल कर रहे हैं और समाज चुप है। एक खबर बनने के आगे बात नहीं जा रही है। बिना दहेज के शादियाँ
नहीं हो रही हैं। बेटियाँ बहू बन कर जल रही हैं। और एक खबर के बाद सब बराबर। सब ढर्रे पर हो जाता है।
आज समाज के कई हिस्सों में औरतें डट कर काम कर रही हैं। पर उनकी तादाद कितनी है। लोक सभा और विधान सभा की बात तो है ही मेरा सवाल है कि हजार ब्लॉगर में औरतें या बेटियाँ कितनी हैं। एक सुनीता और कल्पना के उड़ान भरने से भारत के तमाम पिछड़े गाँवों की लड़कियों को उड़ने का मौका नहीं मिल जाता। वे कैद हैं। कभी संस्कार के नाम पर कभी परंपरा और परिपाटी के नाम पर। आज भी यह गीत सुनाई दे जाता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ। मैं आज के दिन यह कहना चाहूँगी कि औरतें खुद ही अपना भविष्य बदल सकती हैं। और बदलेंगी भी। कभी वह दिन आएगा जब यह गीत यूँ गाया जाएगा अगले जनम मोहे बिटिया कीजौ। डाटर्स डे जिंदाबाद.....।
डॉटर्स डे मना रही हूँ, पर एक सवाल मन में बार-बार उठ रहा है कि चक दे इंडिया में कोच कोई महिला क्यों नहीं। कोई भी कह सकता है कि फिल्म चलती नहीं। खैर ।
बात इतनी सी है कि डॉटर्स डे उन बेटियों तक कोई रोशनी नहीं ले जा रहा है जिन्हें वाकई इस की जरूरत है। डॉटर्स डे या सन डे मनाने भर से बात नहीं बनने वाली। सिर्फ बेटा-बेटी एक समान कह देने भर से मामला दुरुस्त नहीं होती। आज भी लोग बेटी पैदा करने से बच रहे हैं। डॉक्टर आराम से कोख में बेटियों को कत्ल कर रहे हैं और समाज चुप है। एक खबर बनने के आगे बात नहीं जा रही है। बिना दहेज के शादियाँ
नहीं हो रही हैं। बेटियाँ बहू बन कर जल रही हैं। और एक खबर के बाद सब बराबर। सब ढर्रे पर हो जाता है।
आज समाज के कई हिस्सों में औरतें डट कर काम कर रही हैं। पर उनकी तादाद कितनी है। लोक सभा और विधान सभा की बात तो है ही मेरा सवाल है कि हजार ब्लॉगर में औरतें या बेटियाँ कितनी हैं। एक सुनीता और कल्पना के उड़ान भरने से भारत के तमाम पिछड़े गाँवों की लड़कियों को उड़ने का मौका नहीं मिल जाता। वे कैद हैं। कभी संस्कार के नाम पर कभी परंपरा और परिपाटी के नाम पर। आज भी यह गीत सुनाई दे जाता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ। मैं आज के दिन यह कहना चाहूँगी कि औरतें खुद ही अपना भविष्य बदल सकती हैं। और बदलेंगी भी। कभी वह दिन आएगा जब यह गीत यूँ गाया जाएगा अगले जनम मोहे बिटिया कीजौ। डाटर्स डे जिंदाबाद.....।
मंगलवार, 18 सितंबर 2007
रामलीला और सीतवा
देवताओं के साथ लीला
हम जब छोटे थे तब मोहल्ले के बच्चों के साथ एक झुंड बनाकर रामलीला देखने जाते थे। हम लोगों को घर के लोग रामलीला देखने जाने से रोकते थे और रोकने का करण पूछने पर बताया जाता था कि इस तरह की रामलीला में रामायण और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है। फिर भी हम बच्चे किसी ना किसी तरह से रामलीला देखने चले ही जाते थे। कभी घर के लोंगों को पटा कर कभी चोरी छिपे।
वहाँ पहुँच कर लगता कि साक्षात राम सहित सभी देवताओं के दर्शन हो गये। देवताओं को देखने के बाद लगता कि घर वाले ही मूरख थे जो आने नहीं दे रहे थे।
ठीकठाक चल रही रामलीला में कुछ ऐसा होता जिससे सभी दर्शक खूब हँसते। हुआ कुछ ऐसा । लखन को शक्ति वाण लगने पर सीता के रोने का प्रसंग था। सीता रो रहीं थी । दर्शकों का हँसना सीता के रोने पर था । सीता यह कह कर रो रहीं थी कि –
अब हमके फटफटिया पर के घुमाई।
अब हमके जलेबिया के खिआई ।
अब हमके सिनेमा के देखाई
अब हमरे मेला के देखाई।
सीता का यह रोना दर्शकों को रुलाने की जगह हँसा गया था। हँसने में हम भी भूल गये थे कि यह कैसी सीता और कैसा उसका दुख।
बाद में सीता हरण भी हुआ। अगले दिन हम फिर रामलीला मैदान पहुँचे। हम सब तन्मय होकर रामलीला देख रहे थे तभी किसी दर्शक ने कल की लीला में सीता की भूमिका करने वाले लड़के को पहचान लिया। आज उसकी भूमिका नहीं थी और वह खुद रामलीला देखने आया था। अपने पास सीता को पैंट-शर्ट में पाकर हम हैरान थे। कल जिस के हरण और विलाप पर हम रो और हँस रहे थे वह आज हमारे बीच बैठा दूसरे पात्रों पर हँस रहा था । किसी एक ने जोर से पुकारा अरे सितवा आया है ....सितवा । कुछ दर्शक सीता को देखने लपके लेकिन तब तक खेल खतम हो गया दर्शक उठने लगे और सितवा भीड़ में खो गया ।
देवी देवताओं को लेकर घरवालों का नजरिया तब हमें बुरा लगा था लेकिन बाद में हम समझ गये कि घरवाले ठीक थे। आज भी देश में कुछ लोग ऐसा ही कर रहे हैं। उनके लिए सीता राम मजाक के पात्र हैं । खेल का विषय। और हम सब दर्शक । कोई इस खेल को रोकने वाला नहीं है।
हम जब छोटे थे तब मोहल्ले के बच्चों के साथ एक झुंड बनाकर रामलीला देखने जाते थे। हम लोगों को घर के लोग रामलीला देखने जाने से रोकते थे और रोकने का करण पूछने पर बताया जाता था कि इस तरह की रामलीला में रामायण और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है। फिर भी हम बच्चे किसी ना किसी तरह से रामलीला देखने चले ही जाते थे। कभी घर के लोंगों को पटा कर कभी चोरी छिपे।
वहाँ पहुँच कर लगता कि साक्षात राम सहित सभी देवताओं के दर्शन हो गये। देवताओं को देखने के बाद लगता कि घर वाले ही मूरख थे जो आने नहीं दे रहे थे।
ठीकठाक चल रही रामलीला में कुछ ऐसा होता जिससे सभी दर्शक खूब हँसते। हुआ कुछ ऐसा । लखन को शक्ति वाण लगने पर सीता के रोने का प्रसंग था। सीता रो रहीं थी । दर्शकों का हँसना सीता के रोने पर था । सीता यह कह कर रो रहीं थी कि –
अब हमके फटफटिया पर के घुमाई।
अब हमके जलेबिया के खिआई ।
अब हमके सिनेमा के देखाई
अब हमरे मेला के देखाई।
सीता का यह रोना दर्शकों को रुलाने की जगह हँसा गया था। हँसने में हम भी भूल गये थे कि यह कैसी सीता और कैसा उसका दुख।
बाद में सीता हरण भी हुआ। अगले दिन हम फिर रामलीला मैदान पहुँचे। हम सब तन्मय होकर रामलीला देख रहे थे तभी किसी दर्शक ने कल की लीला में सीता की भूमिका करने वाले लड़के को पहचान लिया। आज उसकी भूमिका नहीं थी और वह खुद रामलीला देखने आया था। अपने पास सीता को पैंट-शर्ट में पाकर हम हैरान थे। कल जिस के हरण और विलाप पर हम रो और हँस रहे थे वह आज हमारे बीच बैठा दूसरे पात्रों पर हँस रहा था । किसी एक ने जोर से पुकारा अरे सितवा आया है ....सितवा । कुछ दर्शक सीता को देखने लपके लेकिन तब तक खेल खतम हो गया दर्शक उठने लगे और सितवा भीड़ में खो गया ।
देवी देवताओं को लेकर घरवालों का नजरिया तब हमें बुरा लगा था लेकिन बाद में हम समझ गये कि घरवाले ठीक थे। आज भी देश में कुछ लोग ऐसा ही कर रहे हैं। उनके लिए सीता राम मजाक के पात्र हैं । खेल का विषय। और हम सब दर्शक । कोई इस खेल को रोकने वाला नहीं है।
शुक्रवार, 14 सितंबर 2007
पिछड़े आदमी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट
आज कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी का जन्म दिन है। पढ़िए उनकी दो कविताएँ।
पिछड़ा आदमी
जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था,
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था,
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था,
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
लेकिन जब गोली चली
तब सबसे पहले
वही मारा गया।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला -
'राम'।
दूसरे के मुँह से निकला-
'माओ'।
लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-
'आलू'।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।
पिछड़ा आदमी
जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था,
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था,
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था,
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
लेकिन जब गोली चली
तब सबसे पहले
वही मारा गया।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला -
'राम'।
दूसरे के मुँह से निकला-
'माओ'।
लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-
'आलू'।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।
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