बुधवार, 30 सितंबर 2009
भविष्य का स्वागत करती हूँ
एक थका सा उपन्यास पढ़ रही हूँ लेकिन उसकी कहानी ही नहीं खिसक रही है। नहीं लगता कि यह किताब मुझसे पढ़ी जाएगी। आधी अधूरी पढ़ कर छोड़ी गई किताबों में एक किताब और जुड़ने जा रही है। सोच रही हूँ बाहर निकलूँ तो शायद अच्छा लगे। लेकिन अभी घंटी बजेगी। अभी बच्चे लौट आएँगे। अब तो उनके आने के बाद ही कुछ कर पाउँगी। लेकिन उनके आते ही तो धमा चौकड़ी शुरू हो जाएगी। जीवन का मीठा खेल फिर शुरू हो जाएगा। कई पैरों के सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज आ रही है। बेटी कितने जोर से काँय-काँय कर रही है। निर्भय निरदुंद....मैं उनके घंटी बजाने का इंतजार नहीं कर सकती। बच्चे बाहर दरवाजे की तरफ आ रहे हों तो रुका नहीं जा सकता। चलती हूँ...भविष्य का स्वागत करती हूँ।
रविवार, 30 अगस्त 2009
सुनती हूँ यह सब डरी हुई
सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुई
मैं बाँझ नही हूँ
नहीं हूँ कुलटा
कबीर की कुलबोरनी नहीं हूँ ।
न केशव की कमला हूँ
न ब्रहमा की ब्रह्माणी
न मंदिर की मूरत हूँ।
नहीं हूँ कमीनी, बदचलन छिनाल और रंडी
न पगली हूँ, न बावरी
न घर की छिपकली मरी हुई
फिर भी
मैं सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुई।
नींद में सुनती हूँ गालियाँ दुत्कार
मुझे दुत्कारता यह
कौन है ....कौन है ......कौन है.....
जो देता है सुनाई
पर नहीं पड़ता दिखाई
हर तरफ छाया बस
मौन है मौन है मौन है।
गुरुवार, 27 अगस्त 2009
क्या आप ने भी आराम के लिए लगाया है झाड़ू की तीली से इंजेक्शन

उस खेल में हम कभी-कभी सामने वाले पर अपना खुन्नस निकालते। सुई लगाने के बहाने हम किसी की बाँह पर कस कर चुभा देते। और खेल में रोगी बने लड़के या लड़की की आई आई आई आई.....सुनाई देती । डॉक्टर बना बंदा कहता अरे इतना क्यों रो रहे हो....हम तो आराम के लिए इंजेक्शन लगा रहे है । बस थोड़ी ही देर में सब ठीक हो जाएगा।
जब हम खुद डॉक्टर नहीं बने होते और मरीज के साथ गए होते और अपना बदला भी निकालना होता तो खेल खेल में डॉक्टर को इशारा करते या उसके कान में कहते । वह रोगी की बाँह में जम कर इंजेक्शन चुभाता। और कहता आराम के लिए लगा रहे हैं। अक्सर हैपी, मधु से कान मे बोलता कि शबनम को खूब जोर से इंजेक्शन लगाओ फिर शबनम दो तीन दिन खेलने न आ पाती.......एक बार मैंने भी पूनम के कहने पर मुन्नी को झाड़ू की सुई से पूरा आराम पहुँचाया था। उसकी बाँह से खून निकल आया था। वह जब न रोई तो मैंने उससे पूछा कि रो नहीं रही हो तो उसने कहा कि मेरे आराम के लिए सुई लगा रही हो तो क्यों रोऊँ.....तब उसकी बात पर मुझे रोना आ गया था।
ऐसे होता था हमारा डॉक्टर डॉक्टर का खेल, क्या आप भी ऐसे खेल खेले हैं।
शनिवार, 8 अगस्त 2009
बच्चों की देख-भाल से आजाद हैं लोग, इस आजादी से बचाओ रे राम

बढ़ती महँगाई और तेज रफ्तार जिन्दगी की रेस में जी रही महानगरों की ज्यादातर आबादी यह तो सोच रही है कि उसे क्या कुछ पाना जैसे ढेरों पैसें, घर गाड़ी वो भी एक नही कई-कई, शोहरत, इज्जत। यह सब पाने की चाहत में, माता पिता को फुर्सत ही नहीं मिलती कि उन्होंने जो पाया है उसे संजो कर रखे, अपना अनमोल रतन, अपनी संतान, अपना बच्चा
जन्म लेते ही जिसे बाई को सुपुर्द कर दिया जाता है। इतना ही नहीं इसे अपनी शान की तरह देखा जा रहा है । और दावे से कहा जा रहा है कि हम गवार नहीं कि बच्चे की सूसू पाटी–लालन पालन में गुजार दें।
बात काफी हद तक सच भी लग सकती है कि घर बैठ कर डिप्रेशन का शिकार होने से अच्छा है काम करें । क्या घर डिप्रेशिव दिवारों से होता है या उस घर में रह रहे लोगों से ? अगर पति बाहर काम कर परेशान हो रहा है तो पत्नी घर पर नहीं थकती?
उलझन इस बात की है कि माँ बाप के जद्दो जहद का शिकार हो रहें हैं बच्चे जिनकी
कोई गलती नही है । भागा भागी की रफतार में, हम बड़े खुद तो मुकाम पाने की चाहत में जाग रहे हैं भाग रहे हैं, पर हमारे बच्चे जो कभी आँखों के तारे हुआ करते थे, अब बेचारे हो गए है, इनका दुर्भाग्य यह हैं कि दिन भर माँ नही मिलती क्यों कि वह घर पर होती ही नहीं। अपने लाल-लालनी की खुशियों को अपनी मेहनत से खरीद रही होती है बेचारी। और रात में भी अक्सर इसलिए नही मिलती की वह (माँ) भी थक चुकी होती है और अगली सुबह उसे भागना होता है खुशी की खरीदारी करने। पर अफसोस कि माँ बाप जब तक इस बात को समझे की कहाँ चूक हुई, वक्त हाथ से निकल चुका होता है और भगवान भरोसे हो जाती है इन बच्चों की जिन्दगी
रविवार, 2 अगस्त 2009
स्वतंत्रता पुकारती है, पर इससे बचाओ रे राम

अस्तित्व की स्वतन्त्रता किसे अच्छी नहीं लगती, हर कोई चाहता है कि उसे आजाद छोड़ दिया जाए, उड़ान भरने के लिए । पर ऐसी आजाद उड़ान क्या सही दिशा में पहुँच कर मुकाम तय करेगी, इसकी किसे खबर। यह बात मैं उनके लिए नहीं कर रही जो 18 की उम्र को पार कर चुके हैं बल्कि मै टीन एजर्स की बात कर रही हूँ, जिन्हें सही क्या है और गलत क्या है कुछ पता नहीं होता। इस उम्र में ज्यादा तर बच्चे आजादी चाहते हैं, वे चाहते हैं कि वो जो इच्छा जाहिर करे उसे घर वाले तत्काल पूरा करें, सवाल है क्या हर इच्छा पूर्ति सही है, क्या मां-बाप प्यार में अंधे हो कर अपने ही बच्चे या बच्ची के अस्तित्व को अधर में नहीं लटका देते। जहाँ वह न तो शान से जी सकता है और उसकी मुश्किल है कि मुँह चुरा कर जीना नहीं चाहता है या चाहती हैं ।
अपने ही घर की बात करूँ तो मेरा बेटा मानस जो कि 8वीं में पढ़ता है और घर आने जाने वाले, नातेदार सभी उसकी तारीफ करते कहते हैं कि मानस बहुत सहज सरल है, या मानस बड़ा अच्छा लड़का है, उसकी तारीफ सुन कर खुश होने के साथ ही मैं मन ही मन डर कर कह पड़ती हूँ, हे प्रभो इस जीवन में कुछ देना या न देना दो अच्छे बच्चों की मां जरूर बने रहने देना, पता नहीं भगवान मेरी सुन रहे हैं कि नहीं यह तो समय ही बताएगा, करनी भरनी तो देखना ही होगा।
बनने बिगड़ने के सवाल का जवाब ढूढते हुए मैने आठवीं में पढ़ रहे अपने बेटे मानस से एक दिन पूछा कि जब तुम्हारी कोई माँग तत्काल पूरी नहीं की जाती तो तुम क्या सोचते हो, मानस ने कहा मेरा तो काम है माँग करना, सही या गलत समझना तुम्हारा फर्ज है, तुम मां हो ।
मैंने मानस से समझ लिया मां के फर्ज को ....प्यार दुलार के साथ अनुशासन ही सही दिशा है. ।अक्सर इस बात का भय सताता है कि जो सहज होता है वही जल्दी भटकता भी है.....। अगर बात करूँ पारिवारिक माहौल की तो यह भी तय है कि कोई भी घर- परिवार झगड़े और वैचारिक भेद से परे नहीं है । इस परिस्थित में यदि हम पति- पत्नि के बीच बहस होती है, वह चाहे पारिवारिक हो या कोई सामाजिक, राजनितीक मुद्दा, उस वक्त हम या कोई भी सिर्फ अपनी बात साबित करने पर तुले होते हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि इस बहस का नतीजा हमारे बच्चों को क्या क्या सोचने को मजबूर करेगा । ऐसी ही बहस की स्थित में एक दिन मैनें बेटे मानस से पूछा बेटा, तुम मेरे और पापा के बारे क्या सोचते हो सिर्फ एक एक वाक्य लिख कर दो। बेटे ने लिखा मेरे पापा बहुत मजाकिया और थोड़े गुसैल आदमी है । मेरी माँ नेक ख्याल रखने वाली पारखी महिला है, हम दोनों के बारे में मानस की यह राय सुकून देती रही। साथ ही मानस से जब यह पूछा कि अगर तुमसे कहा जाए कि तुम अपने फैसले खुद लो तो उसने उत्तर दिया, फैसला लेना तो आता ही है पर उस फैसले से मुझे सही मुकाम मिलेगा या नहीं यह पता नहीं, ऐसे फैसले तो जिन्दगी को जुए की तरह खेलने जैसा होगा जहाँ हमें जीत भी मिल सकती है बरबादी भी।
मेरे कहने का मतलब सिर्फ यह है कि क्या 18 साल से कम उम्र के बच्चों को पूरी स्वतन्त्रता दे दी जाए? क्या हर बच्चा परिस्थित के हिसाब से सही को सही और गलत को गलत समझ सकता है ?
लगातार.......
सोमवार, 4 मई 2009
लोक सभा टीवी पर मेरी कविता
बहुत पहले से लिखती रही । लिख लिख के भूलती रही। लेकिन छपने का सिलसिला बहुत देर से शुरू हुआ। न जाने कितनी कविताएँ इधर उधर बिखरी पड़ी हैं। कुछ बदल तो रहा नहीं है। कुछ डायरियाँ मायके के घर में रह गईं। बाद में उन्हें जाकर ले आई। कभी-कभी मन में आता था कि लिखने से क्या होता है। एक दो क्या सब कविताओं को कहीं गुम कर दूँ। भूल जाऊँ कि लिखती भी हूँ। कभी-कभी ऐसा हुआ भी कि महीनों क्या सालों नहं लिखा। हल्दी तेल नोन राई के झंझट में ऐसी उलझी कि कविता क्या खुद को भी भूल सी गई। चाँद की रोशनी बहुत उबाऊ सी लगी। बच्चे और पति तक से उलझन होने लगीं। सुबहें फीकी और दोपहरे बोझ सी लगीं। जीवन फालतू सा लगा। निरुद्देश्य लगी एक एक सांस।
लेकिन अभी ऐसा नहीं लगता। कुछ कविताएँ ज्ञानोदय, वागर्थ और कथादेश में प्रकाशित हुई हैं तो कुछ और कविताएँ देशज सहित कुछ अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली हैं। लोगों ने पढ़ कर उत्साह बढ़ाया। लगा कि लिखा जा सकता है। मन में यह बात अभी भी बैठी है कि लिखने से कुछ बदलेगा कि नहीं। किंतु लिखती जा रही हूँ। लगातार ।
इसी बीच पिछले बुध को दिल्ली से बोधिसत्व के मित्र नागेश ओझा जी का फोन आया कि मेरी एक कविता लोक सभा टीवी पर पढ़ी गई है। स्त्रियों से जुड़े किसी परिसंवाद में कार्यक्रम की संचालिका ने मेरी स्त्रियाँ कविता जो कि ज्ञानोदय और कथादेश दोनों में प्रकाशित हुई है पढ़ी। इस खबर से मेरे पंख निकल आए। दिन भर उड़ती रही। लगा कि सच में लिखना सार्थक रहा। लेकिन वह सवाल अभी भी बना है कि क्या लिखने से दुनिया बदल जाएगी। क्या लोक सभा टीवी पर कविता पढ़े जाने से समाज पर कोई असर पड़ेगा। तमाम सवाल हैं. फिर भी लिखती रहूँगी। पढ़ें आप भी मेरी वह कविता जिसे लोक सभा टिवी पर पिछले बुधवार को पढ़ा गया है।
स्त्रियाँ
स्त्रियाँ घरों में रह कर बदल रही हैं
पदवियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी,
स्त्रियाँ गढ़ रही हैं गुरु
अपने दो चार बुझे अनबुझे शब्दों से
दे रही हैं ढ़ाढ़स,
बन रही हैं ढ़ाल
तमाम घरों के लिए बन कर ढ़ाल
खा रही हैं मार
सदियों से सह रही हैं मान और अपमान
घर और बाहर सब जगह।
फिर भी
खठकरेजी स्त्रियाँ बढ़ा रही हैं मर्यादा कुल की,
खुद की मर्यादा खो कर।
आगे निकलना तो दूर
जिंदगी की भागम भाग में
बराबरी तक के लिए
घिसटते हुए
दौड़ रही हैं पीछे-पीछे
सम्हालती हुई गर्भ को।
और उनको सम्हालने के लिए
कोई भी रुक नहीं रहा है
फिलहाल।
रविवार, 5 अप्रैल 2009
तब तो हर स्त्री, हर पत्नी हर माँ वेश्या है मसिजीवी जी
आपकी अनाम निलोफर के मैले तर्कों पर सफाई नुमा पोस्ट देखी। आपने माँ बाप द्वारा बच्चों के लालन पालन में किए गए कार्य को मैला कमाने से तुलना की है -
“ अपने बच्चे के पाखाना साफ करने से बचने वाली... बच सकने वाली मॉं कहॉं पाई जाती है ? कौन सा बच्चा कभी अपने पाखाने से खेलने का सत्कर्म नहीं कर चुका होता? ”
आपकी तुलनात्मक मेधा को सलाम करने का मन है। सलाम करती हूँ। किसी के पास ऐसे धुरंधर तर्क का क्या उत्तर हो सकता है। आपके कथन से तो भारत की सब सामाजिक बुराई एक झटके में छू मंतर। और जो थी वह महज वहम थी। क्योंकि मामला बचकाना है अरे गू साफ करना भी कोई समस्या है। तभी तो आप ताव से कह पाते हैं-
“ हमने भी अपने बच्चों का मैला कमाया है... आप चाहें तो कहें हमें भंगी/चमार ”
लेकिन भाई बात इतनी सहज नहीं है जितनी सहजता से आप ने कह दी है भाई। मेरा एक सवाल है। यह कहाँ तक उचित है कि आप या कोई निलोफर पहले किसी को भंगी, चमार कह देंगे और जब उस पर जब कोई आपत्ति करेगा तो आप कह देंगे कि हम सब अपने घर का पाखाना साफ करते हैं तो हम सभी भंगी हैं( मैं इन शब्दों को प्रयोग के लिए माफी चाहती हूँ....)। फिर कोई किसी को चमार या मोची या कसाई या नाई या धोबी कह देगा और आप उसकी सफाई में कह देंगे कि हम सभी जूते पालिश करते हैं मीट मछली के लिए कभी कभार चाकू भी उठा लेते हैं, अपने बाल दाढ़ी भी बना लेते हैं, घर में कपड़े भी साफ कर लेते हैं। तो हम सब हुए ना चमार, मोची कसाई, नाई, धोबी। कितना सहज सामान्य और निर्मल तर्क है।
मैं नहीं कह सकती कि आपने इन सामाजिक पेशे से जुड़े शब्दों में समाए अपमान का कितना अंश सहा झेला है। न झेला हो तो ही सही है और आप कभी न झेलें यही दुआ करूँगी।
चमार होना देश में कितना बड़ा अभिशाप है यदि आप इस बात को समझते तो शायद उस अपमान के पेशे की तुलना घर के भीतर सिमटी कार्रवाई से न कर बैठते। अपने बच्चे का मैला साफ करना और सामाजिक रूप से भंगी होना किस तर्क से एक समान है, अपने गुह से खेलना और सिर पर दूसरों का मैला ढोना आपके लिए यदि बराबर हो तो कल आपके घर मैला भेजने का प्रबंध किया जाए या आपको दिल्ली नगर निगम में मैला कमाने का काम दिलाया जाए या आप स्वयं जा कर जुट जाएँ मैला कमाने । मैले से खेल कर एक बार अपना मन पवित्र कर लें। बहुत दिन हो गया होगा घर के बाहर के मैले से खेले। क्या आपको याद है कि कभी आपने रेलवे स्टेशन, सिनेमाघर,बस अड्डे या किसी पड़ोसी के यहाँ जाकर उसका संडास साफ किया हो। उसका गू उठाया हो। उसके शौच घर को साफ सुथरा किया हो। क्या आपने कभी इस या इस तरह के किसी भी पेशे में सिर झुकाया है। हाथ लगाया है। किसी का गुह हटाना बहुत बड़ी बात है यहाँ तो लोग अपने घर के बड़े बूढ़ो तक को किसी नर्स किसी नौकर के हाथों लगा देते हैं।
रही बात गीतकार लेखक कवि स्वर्गीय नरेन्द्र शर्मा की पत्नी के नाम के आगे शर्मा लिखने की तो वे क्या लिखें से पहले मेरा प्रश्न है कि वे क्यों न लिखें शर्मा। आप अपने नाम के आगे क्या लिख कर पैसा कमाते हैं। आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ...नाई,चौहान हैं या सिंह दुबे या यादव इसमें लज्जित होनेवाली कौन सी बात है।( भंगी लिखना या कहाना सचमें आपके सिवा शायद ही कोई और पसंद करे)। क्या अपने जाति गोत्र को छिपाना भी किसी सामाजिक क्रांति का हिस्सा है। क्या इस महान देश में अपने जाति गोत्र धर्म क्षेत्र आदि को कभी छिपा सकते हैं। मेरा मानना है कि नहीं यह सम्भव नहीं है। जातिवादी, धर्मवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी होने और अपने जाति धर्म, भाषा पर अभिमान करना दोनों दो बाते हैं। आप लावन्या जी को केवल इस लिए नहीं घेर सकते कि वे अपनी माँ के प्रति कहे गए शब्दों से अपमानित पा रही थीं। यदि लावण्या जी को अपने विद्वान पिता और गरिमा मई माँ के प्रति सम्मान की भावना है तो क्या यह कोई अनैतिक बात है। क्या यदि उनमें उच्चकुलता का बोध है तो आप उन पर अपने मन का मैला फेंक कर मलिन करेंगे। उनके ब्राह्मणत्व को छीन कर उन्हें बिना हरिजन या चमार बनाए आप नहीं शांत होंगे। आपकी बातों से कुछ अलग तरह की गंध आ रही है।
कम शब्दों में कहूँ तो आपके तर्क कुछ ऐसे हैं कि पहले आप या कोई निलोफर किसी को वेश्या कह दें फिर बाद में सफाई में आप यह कहें कि हर स्त्री, हर पत्नी हर माँ वेश्या है क्योंकि संतान पैदा करने के लिए जो काम वेश्या करती है वही काम स्त्री,पत्नी, माँ को भी करना पड़ता है। आप क्या इस बात की छूट देंगे कि कोई आपके परिजनों को आपकी माँ आपकी पत्नी को सामाजिक रूप से ऐसा कुछ कहे। क्या आप अपने घर में स्वजनों के लिए ऐसा ही साधारण संबोधन प्रयोग करते हैं। क्या आप इन्हीं तर्कों के आधार पर अपनी पत्नी, माँ या बहन को वेश्या कहते हैं। यदि कहते या समझते हों तो कृपया ऐसा न करें। मुझे आपसे यह उम्मीद थी और है भी कि कम से कम माँ के प्रति किसी की भी भावनाओं पर प्रहार कर सुख पाने की कोशिश न करेंगे। माँ तो माँ ही होती है। चाहे आपकी हो मेरी या लावण्या जी की।
मैं यह भी नहीं समझ पा रही कि इस पूरे मामले में चोखेरबाली समुदाय चुप क्यों है। और आप इतनी बेताबी से शर्मा को शर्मा कहने का विरोध और भंगी को भंगी कहने को बेताब क्यों हैं। आप के मन में इन दोनों तबकों के प्रति कोई और भावना तो नहीं क्योंकि आपके लेख में पालिमिक्स कम प्रतिशोध अधिक है ऐसा न होता तो आप और लावन्या जी की माँ का अनादर करने वाले माफी माँग कर किसी शुभ काम में लग जाते। लेकिन आप तो लगातार मसि बहाने में लगे हैं। आप पर तो बड़े भाइयों के कहने का भी शायद ही कुछ असर नहीं है। समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं। जो भूल स्वीकारने में भरोसा नहीं रखते।
सधिक्कार
आपकी
आभा
नोट- कुंदा वासनिक पर लावन्या जी का शानदार लेख अंतर्जाल से नदारद है। साथ ही उनकी निलोफर के विषाक्त मन को समझने वाला लेख भी। हम उसके लिंक नहीं दे रहे हैं।